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Saturday, January 14, 2017

Unknown

pashu me lagne wale rogo ki janakri part 2 पशु रोगों की पहचान भाग 2

नमस्कार दोस्तों पिछली पोस्ट पशुओं में होने वाले रोगों की पहचान कैसे करे भाग 1 में हमने 14 प्रकार के रोगों के बारे में जाना था यदि आपने वो पोस्ट नही पढ़ पाए तो यहाँ क्लिक कर के पढ़ ले
pashu rog pahchan part 2
पशु रोग के बारे में 
आज की इस पोस्ट में हम बाकी पशु रोगों के बारे में जानेंगेदोस्तों पशुओं में कई सारे रोग होते है यहाँ में कोशिश करुँगा की ज्यादा ज्यादा रोगों के बारे में बताऊ फिर भी बहुत सारे रोग छूट जायेंगे जो छूट जायेंगे उनके बारे में next time बताएँगे तो चलिए सीधे मुद्दे की बात करते है 

pashu me lagne wale rogo ke bare me janakri part 2

1 सर्रा रोग ⇒

दोस्तों यह रोग ट्रिपैनोसोमा -एवेनसाई  नामक परजीवी कीटाणु के कारण फैलता है। यह बीमारी मेरुदंड वाले पशु जैसे घोड़े,गधे ,ऊँट एवं खच्चरों में अधिक लगता है। यह रोग वर्षा ऋतु के बाद अधिक फैलता है जो की मक्खियों द्वारा इसे फैलाया जाता है इस रोग से पशु में बुखार आता है पशु के खून में कमी आ जाती है पशु सुस्त रहता है उसका वजन कम हो जाता है कोई कोई पशु चक्कर भी काटने लगते है पशु की नज़र कमजोर हो जाती है। पशु दाँत पीसने लगता है बार बार मल मूत्र त्याग करता है गाय भैंसों  में इस रोग का आसानी से पता नही चल पाता है क्यों की बाहरी लक्षण इतने स्पष्ट रूप से नही दीखते है

2 पशु  मुहँ के छाले एवं घाव ⇒

 पशु के पेट में ख़राबी होने से उनके मुहँ में घाव और छाले हो जाते है। जिससे पशु के खाने पीने में दिक्कत होती है वो दिन प्रतिदिन दुबला होता जाता है !यह रोग बढ़ने पर मुहँ के छाले पेट और आंतों में फेल जाते है और पशु की मृत्यु हो जाती है इसके लक्षण कभी कभी पशु को ज्वर आ जाता है मुहँ से जाग निकलते है जीभ सूज जाती है पशु की जीभ तालू होठ आदि लाल हो जाते है पशु खाना पीना छोड़ देता है 

3 अफ़रा रोग ⇨

यह रोग पशु के अधिक खाने से होता है जिसमे पशु का पेट फूल जाता है इस रोग के बारे में मैने पूरी जानकारी विस्तार से लिखी है जिसमे रोग के लक्षण और बचाव के साथ साथ घरेलू उपचार एवं दवाइयों के बारे में लिखा है आप इस लिंक को खोल कर जानकारी पढ़े ⇒⇒⇒ पशु में अफरा रोग होने पर क्या करे 

4 पशु में दस्त ⇨

पशु में दस्त लगने का मुख्य कारण अपच यानि पाचन क्रिया ढंग से नही होने से होती है क्यों की कई बार पशु सडा गला दूषित भोजन और गन्दा पानी पी लेता है और जुगाली करने के लिए पर्याप्त समय नही मिल पाने से और चारा खाते ही तुरंत काम पर लग जाने से ये रोग हो जाता है इस रोग के कारण पशु पतला पतला गोबर करने लगता है बिना पची हुई वस्तु गोबर में निकालने लगता है उसकी भूख कम हो जाती और प्यास बढ़ जाती है उसकी त्वचा सूख ने लगती है ये सब लक्षण पशु में दिखने लगते है

5 कण्ठ अवरोध ⇒

जब पशु कोई ऐसी कड़ी वस्तु जैसे गाजर मूली गुठली या कोई फल को बिना चबाये निगल जाता है तो वह भोजन की नली यानि गले में जा कर अटक जाता है पशु बार बार उसे निगलने की कोशिस करता है बार बार खासता है मुँह से लार निकलता है ऐसी अवस्था में पशु काफी ज्यादा बेचैन हो जाता है यदि उसके गले में वो वस्तु ज्यादा देर तक रहती है तो पशु को अफ़रा हो जाता है और पशु मर जाता है इसका एक ही उपाय है तत्काल अटकी हुई वस्तु को किसी भी उपाय से निकलवा दे या फिर पशु सर्जन से आपरेशन करवाये 

6 पशु जुगाली न करना ⇒

पशु को चारा खिला कर सीधे काम पर लगा देना ख़राब भोजन या चारा पशु को खिला देना जुगाली के लिए पर्याप्त समय ना  देना पशु में बदहजमी  आदि कारणों से पशु में यह रोग हो जाता है 

7 उदरशूल ⇨

80 प्रतिशत पशु रोग पशु के खान पान से संबंधित होते है जब पशु कड़ी सुखी घास या टहनी आदि खा लेते है और खाने के बाद या तो पानी नही पीते है या काम पानी पीने से उदरशूल हो जाता है इससे पशु के पेट में ज़ोरदार दर्द होता है पशु बार बार अपने पैर पटकता है दाँत पिसता है पशु बे चैन रहता है बहुत काम और बदबूदार गोबर करता है 

8 पशु में कब्ज ⇨

पशु अधिक मात्रा में सूखा चारा और भूसा खा लेने और कम पानी पीने से एवं  बदहजमी हो जाने पर पशु में कब्ज की शिकायत हो जाती है जिसमे पशु सूखा कड़ा सख़्त गोबर करता है और कभी कभी गोबर भी नही कर पाता है गोबर में कभी खून के छींटे या माँस की मात्रा भी आने लगती है 

9 खांसी ⇒

मौसम में परिवर्तन और बारिश में पशु का लगातार भीगना और फेफड़ों पर धूल का जम जाना एवं अपच के कारण पशु में खांसी हो जाती है जिसमे पशु बार बार खांसी का ठसका उठता है उसके उसके गले से खर्र खरर  की आवाज़ निकलती है और कफ जम जाता है ज्यादा समय तक खांसी रहने से पशु में निमोनिया और दमा जैसे रोग लग जाते है 

10 निमोनिया एवं दमा ⇒

मौसम के परिवर्तन और बरसात में बार बार भीगने और अधिक ठंडा पानी पीने से पशु में निमोनिया हो जाता है जिसमे बुखार के साथ शरीर कांपने लगता है पशु बेचैन रहता है उसे सास लेने में दिक्कत आती है वह अपने नथुनों को बार बार फूलता है और चलने और बैठने में पशु को परेशानी आती है उसकी आँखो का रंग लाल हो जाता है 
दमा  दमे में पशु जल्दी जल्दी ख़स्ता है और बहुत ही ज़ोर कर के पशु को खाँसना पड़ता है जिससे उसके पेट ओर खोख पर दबाव बढ़ता है और दर्द होता है खांसी के साथ बलगम भी आने लगता है यह रोग बदहजमी लम्बे समय तक खांसी रहने और ज्यादा मेहनत करने से होता है

11 पशु के पेशाब में खून आना ⇒

पशु के पेशाब में खून कही कारणों से आ सकते है जैसे अधिक धूप में रहने या काम करने से किसी तरह की ज़हरीली घास या पेड़ पोधों के पत्ते खा लेने से या फिर पथरी हो जाने पेशाब  की नली में घाव हो जाने से किसी अन्य पशु के द्वारा उस पशु को सींगों से कमर गुर्दो पर चोट पहुँचाने  से पशु में मूत्र के साथ खून आने लगता है और तेज़ बुखार भी पशु में आ जाता है

12 पशुओं में पीलिया ⇨

यह रोग पशु में जिगर की ख़राबी के कारण होता है जिसमे आँखों की झिल्लियों का रंग पीला पड़ जाता है पशु पिले रंग का पेशाब करने लगता है इसमें पशु की की भूख मर जाती है और प्यास बढ़ जाती है पशु कमजोर होने लगता है और पशु के शरीर का तापमान घटता बढ़ता रहता है

13  मर्गी ⇒

यह रोग खास कर के पशुओं के बच्चों में होता है इसका मुख्य कारण पशु के पेट के कीड़ों का पशु के दिमाग में चढ़ जाने से होता है जिसमे पशु अचानक कांपने लगता और चक्कर खा कर गिर जाता है और बेहोश हो जाता है इस अवस्था में पशु के हाथ पैर अकड़ जाते है और मुहँ से झाग आने लगते है

14 पशु को लू लगना ⇒

वैसे तो सभी पशु पलकों को पता होता है की पशु में लू केसे लगती है फिर भी में यहाँ बता देता हु ताकि अगली पोस्ट में रोगों के उपचार केसे करे उसमे इसके उपाय बता सके यह रोग गर्मी के दिनों में तेज़ धूप और गर्म हवाओं के लगने से होता है इसमें पशु ज़ोर ज़ोर से हापने लगता है पशु में ज्वर रहता है पशु बहुत कम खाता पिता है

15 पशु को ज़हरीले  जानवर काट जाने पर ⇒

कई बार पशु को जहरीले जानवर किट काट लेते है जैसे बिच्छू ,ततेया ,मधुमक्खी आदि काट जाने पर पशु अचानक बेचैन हो जाता है और उसे काटे गये स्थान पर जोरों से जलन होने लगती है और सर्प के काटने पर पशु में शीतलता आ जाती है पशु की आंखे पथरा जाती है पशु के शरीर का रंग काला नीला पड  जाता है पशु के नाड़ी की गति कम हो जाती है और पशु के मुँह से झाग निकलने लगते है

16 मसाने में पथरी ⇒

यह रोग पशु में रूखे सूखे एवं भारी पर्दाथ और कम पानी और चुनायुक्त अधिक पानी पीने से होता है इसमें पशु के गुर्दे ,मसाने में तेज़ दर्द होता है जिससे पशु बार बार उठता बैठता है पशु बेचैन रहता है पशु में मूत्र रुक रुक कर बूंद बूंद आता है मूत्र का रंग गहरा लाल रक्त मिश्रित रहता है

17 कृमि ⇒

कृमि कई रूप रंग आकर छोटे मोटे हो सकते हैअंकुश कृमि ,फीता कृमि ,पिन कृमि ,गोल चपटे कृमि ,फुफ्फुस कर्मी आदि इनकी कई सारी प्रजाति होती है। इन कृमियों के कारण कई सारे रोग पैदा हो जाते है कृमि पशु के पेट आंतो और फेफड़े आदि अंगों में रहते है। जो की गोबर और मूत्र  जरिये बाहर निकलते है और संक्रमण फैलाते है। ये कृमि सभी तरह के पशुओं में होते है जैसे गाय ,भैस ,बैल ,ऊट ,भेड़ बकरी ,घोड़ा ,सुअर ,कुत्ता ,बिल्ली ,मुर्गी में भी कई प्रकार से पाए जाते है। पशुओं के बच्चों में पेट के कीड़े की समस्या भी कृमि और बाहरी परजीवी के दुवारा होती है इन कृमियों के कारण कई सारे रोग पशु में लगते है जैसे चर्म रोग ज्वर दस्त पेशीच उपज कब्ज आदि

18 बवासीर ⇒

यह रोग जिगर और ज्यादा समय से पशु में कब्ज रहने से होता है इस रोग की पहचान करने के लिए पशु यदि गोबर के साथ खून मिला हुआ आता है तो पशु को बवासीर हो जाता है इस रोग में पशु के मलद्वार पर मस्से हो जाते है

19 जुकाम और सर्दी ⇒

यह रोग अधिक ठंडा पानी पी लेने से या फिर पशु का तेज़ गर्मी से अधिक ठंडी जगह पर आ जाने से होता है कभी कभी पशु को ज्यादा गर्मी में ठंडे पानी से नहला देने से भी हो जाता है इस रोग में पशु को बार बार छींक आती है नाक से पानी बहता है और नाक की झिल्ली लाल हो जाती है! ज्यादा सर्दी रहने पर  तेज़ बुखार भी आ जाता है

20 पशु में  लकवा ⇒

इस रोग में पशु का कोई अंग हिस्सा काम करना बंद कर  देता हैयह रोग रीड की हड्डी में कीड़े पड़ने चोट लगने से हो जाता है इसके अलावा पशु कभी जहरीली घास खाने से भी हो सकता है 

21  केल्सियम और फास्फोरस की कमी से होने वाले रोग ⇨

कैल्शियम और फास्फोरस की कमी के कारण पशु में निम्न रोग लग जाते ह 
पशु को भूख नही लगना 
रीड की हड्डी में टेढ़ापन आ जाना 
पशु के शरीर का ग्रोथ नही कर पाना 
दूध में कमी आ जाना 
पशु का गर्भ धारण नही कर पाना 
फास्फोरस की कमी होने से पशु हड्डी और मॉस खाना स्टार्ट कर देता है 
मित्रों इन रोगों के अलावा भी पशु में कई सारे रोग होते है जैसे 
पाईरो प्लाज्म से होने वाले रोग ,काक्सीडिया से खूनी पेचिस होता है ,प्रोटोजोआ से मलेरिया ,हेपाटोजुन ,आदि रोग लगते है 
दोस्तों इन मुख्य रोगों के अलावा भी पशुओं में कई सारे रोग होते है जिनकी समय समय पर पहचान कर के उचित इलाज़ पशुपालकों को करवाना चाहिए ताकि उनका पशु असमय ना मरे 
मेरा इस पोस्ट के लिखने का उद्देश्य बस यही था की किसान दोस्त इन पशु रोगों की पहचान कर समय पर पशु का उपचार करा ले ताकि पशु पालक को इस व्यवसाय में  हानि ना हो
दोस्तों आप पशु पालन से जुड़ी और पोस्ट पड़ना चाहते हो तो menu में जा कर पशु पालन वाले टेग को सलेक्ट करे!
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Sunday, December 25, 2016

Unknown

pashuo me hone wale rog or unki pahchan kese kre part 1 पशुओ के रोगों की पहचान भाग 1

नमस्कार दोस्तों आज हम इस पोस्ट में पशु पालन करने वाले किसानों के लिए बहुत ही काम की जानकरी ले कर आयें है उम्मीद है इस जानकरी से पशुपालको  को काफी लाभ मिलेगा आज की पोस्ट में हम बताएँगे

पशुओं में होने वाले रोग एवं उनकी पहचान कैसे  करे भाग 1

pashu me lagne wale rog ki janakri
पशु रोग की जानकारी 

मित्रों पशु पालन एक लाभ दायक  व्यवसाय है लेकिन यदि पशुपालक सावधानी नही रखे तो उसे भारी नुक्सान उठाना पड़ सकता है खासतौर पर जब पशु बीमार हो क्यों की वर्तमान में अच्छे दुधारू पशु का मूल्य काफी ज्यादा है और बीमारी के कारण कोई पशु मरता है तो इस धंधे में बहुत नुकसान होता है आज की इस पोस्ट में पशुओं में लगने वाले रोगों की पहचान के बारे में जानेंगे मैने इसको भाग 1 नाम इसलिए दिया क्यों की सभी रोगों को एक पोस्ट के माध्यम से बता नही सकते बाकी बचे रोगों के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा आप माय किसान दोस्त पर विजिट  करते रहे इन रोगों के बारे में बताने के बाद हम एक पोस्ट में पशुओं के रोगों का देशी इलाज यानि उपचार कैसे करे और पशुओं के लिए विभिन्न दवाइयों के बारे में भी लिखेंगे

पशुओं के प्रमुख रोग और उनके लक्षण 

संक्रमण रोग;- छूत के कारण होने वाले रोगों को संक्रमण रोग कहते है यह रोग पशु के शरीर में कई प्रकार के विषाणु चले जाने के कारण होता है फिर ये एक पशु से दूसरे पशु में लगते है फिर एक के बाद एक पशु बीमार होते है फिर एक महामारी के रूप में फेल जाते है 
संक्रमण से होने वाले रोगों के बारे में नीचे बताया गया है!

1 लगडा बुखार (black quarter)

जैसे की इसका नाम लगडा बुखार है उसी तरह इसका काम है इस बुखार में पशु के आगे पीछे के पैरो में सूजन आ जाती है और पशु लगडा लगडा चलता है इस में कीटाणु पानी अथवा शरीर पर लगे घाव के जरिये शरीर के अन्दर चले जाते है जिससे पशु का शरीर अकड़ने लगता है इसके कीटाणु पुरे शरीर में जहर बना देते है यदि समय पर उपचार नही किया जाया तो पशु एक दो दिन में ही मर जाता  रोग में पशु का शरीर सुस्त हो जाता है धीरे धीरे पूरा शरीर अकड़ जाता है बड़ी मुश्किल से चल पता है उसका सर और कान लटक जाते है। उसकी त्वचा पर सूजन दिखने लगती है। उसका पूरा शरीर गर्म हो जाता है और तीव्र बुखार आता है एवं सास लेने और छोड़ने पर परेशानी आती है इस अवस्था में वो खाना पीना बंद कर देता है यह रोग मुख्य रूप से गाय भैस एवं भेड़ में ज्यादा देखने को मिलता है छह वर्ष से दो वर्ष के पशु इसकी चपेट में ज्यादा आते है

2 माता रोग (rinderpest )

यह भी एक छूत वाला रोग ही है जो की पहाड़ी क्षेत्र  में रहने वाले पशुओं में अधिक पाया जाता है इस रोग का चार पांच दिन में आसानी से पता लग जाता है। इस रोग में सबसे पहले पशु को बहुत तेज़ यानि की 104 डिग्री से 106 डिग्री तक हो जाता है पशु सुस्त हो जाता है उसके शरीर के बाल खड़े हो जाते है पशु कांपने लगता है आँखो की पुतलिया सिकुड़ जाती है और आँखो से आँसू बहने लगते है कान सर और गर्दन लटक जाती है। पशु एस अवस्था में अपने दाँत पीसने लगता है और उसे प्यास लगने लगती है वो जुगाली करना बंद कर देता है सात आठ दिन बाद पशु के मुहँ में मसूड़ों और ज़ुबान के आसपास नुकीले छोटी किल tyap के छाले  हो जाते है और धीरे धीरे वो बड़े हो कर फोफले बन जाते है इसे ही छाले पशु के आंतों में भी हो जाते है पशु खाना पीना बंद कर देता है पतला गोबर करने लगता है कभी कभी उसके गोबर में खून आने लगता है मुँह में छाले की वजह से पशु भूखा रहता है और कमजोर पड़ जाता है और सात आठ दिन में पशु मर जाता है

3 गल गोटू रोग (haemorrhagic )

यह रोग मुख्य रूप से गाय भेसो में अधिक लगता है यह मानसून के समय व्यापक रूप से फैलता है यह बहुत ही तेज़ एवं भयंकर छूत  रोग होता है इसमें पशु के शरीर का तापमान 105 डिग्री से ले कर 108 डिग्री तक पहुँच जाता है। यह pesteurella multocida नामक जीवाणु  के कारण होता है। इस रोग में पशु के मुँह से लार टपकती है सिर और गले में बहुत दर्द होता है पशु कांपने लगता है खाना पीना छोड़ देता है। पशु के पेट में दर्द होता है वह ज़मीन पर गिर जाता है उसकी आंखे लाल हो जाती है श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है पशु खूनी दस्त करने लगता है उसकी जीभ का रंग काला पड़ जाता है और वो बाहर की और लटक जाती है इस बीमारी में ७० प्रतिशत पशु तत्काल मर जाते है। इसलिए इसका उपचार लक्षण पता चलते ही जितना जल्दी हो सके करना चाहिए इस रोग से मरे हुए पशु को दफ़ना चाहिए उसे फेंकना नही चाहिए वरना उसके संक्रमण से अन्य पशु इसी बीमारी के चपेट में आकर मर जाते है

4 खुर मुहँ पका रोग (foot and mouth disease )

पशुओं में खुर मुखपाक रोग अत्यधिक संक्रमण एवं घातक रोग होता है यह रोग फटे खुर वाले पशुओं में होता है यह रोग कभी भी किसी भी मौसम में हो सकता है। इस रोग के लक्षण रोग ग्रसित पैर का ज़मीन पर बार बार पटकना लगडा कर चलना खुर के आसपास सूजन रहना खुर में घाव और कीड़े पड़ना मुहँ से लार पटकना मुहँ जीभ ओष्ट पर छाले हो जाना स्वस्थ होने के बाद भी हापना बुखार का आना होठ लटक जाना रोग के अधिक बड जाने पर नथुने में फोफले बन जाना। दुधारू पशु में दूध की कमी आ जाती है उसकी कार्य करने की क्षमता  कम हो जाती है

5 विष ज्वर/बाबला रोग (anthrax )

यह भी एक संक्रमित रोग है गाय बेल भैस के अलावा यह अन्य पशुओं में भी होता है यह रोग कुत्तों और सुअर में नही होता है। इस बीमारी में पशु को 106 या 107 डिग्री तक तेज़ बुखार रहता है। इसमें पशु की त्वचा का रंग मटमैला और नीला पड़ जाता है पशु की आँखो की चमक ख़तम हो जाती है। इसमें पशु बेचन होकर खूटे के चक्कर लगता है और दर्द के मारे चिल्लाते भी है। गोबर के साथ खून का आना और गहरे रंग का पेशाब आना इसके लक्षण है फिर पशु बेहोश हो जाता है एक दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाती है

6 फुफ्फुस ज्वर (contagious pleuro pneumonia)

इस रोग को निमोनिया भी बोलचाल की भाषा में कहते है यह बहुत ही सूक्ष्म जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है इसमे सबसे पहले पशु को तेज़ बुखार आता है उसमे सभी लक्षण निमोनिया के दीखते है। पशु सुस्त हो जाता है और खाना पीना छोड़ देता है श्वास लेने छोड़ने में परेशानी आती है नाक में सर्दी रहती है और बार बार ख़ासी का ठसका उठता रहता है यह रोग अत्यधिक तेज़ हो जाने पर पशु की श्वास रुक जाती है और पशु की मृत्यु हो जाती है

7 सक्रमक गर्भपात (brucelosis)

यह रोग विशेष कर गाय और भेसो में होता है यह रोग बुसेला कीटाणु एवं संक्रमण के कारण होता है इसमें बच्चा समय से पहले ही गर्भ में गिर जाता है इस रोग में पांचवें या आठवें माह में ही गर्भपात हो जाता है जिससे पशु की जेर गर्भ में ही रह जाती है जिसे निकलना अतिआवश्यक हो जाता है इस रोग में योनी और गर्भाशय में सूजन आ जाती है और योनी का बाहरी भाग लाल हो जाता है

8 थनैला रोग (mastitis )

यह भी एक जीवाणु जन्य संक्रमित रोग है। जो की दुधारू पशुओं में होता है यह रोग कई तरीके के जीवाणु विषाणु यीस्ट एवं फफूंद और मोल्ड के संक्रमण के कारण होता है इस रोग के लक्षण में सर्वप्रथम पशु के थन गर्म हो जाते है थनों में सूजन एवं दर्द रहता है। इस दौरान पशु के शरीर का तापमान भी बड जाता है और पशु के दूध में की मात्रा और गुणवत्ता कम हो जाती है दूध में खून का छटका भी आता है

9 खूनी पेशाब आना (contagious red water )

इस रोग में पशु को तेज़ बुखार आता है जिससे आँख और जीभ पर पीलापन आ जाता है पेशाब के साथ साथ खून भी आने लगता है एवं दस्त लग जाती है 

10 दुग्ध ज्वर (milk fever)

मिल्क फीवर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं में केल्सियम की कमी के कारण होता है यह रोग प्राय 5 से 10 साल वाली मादा पशु में प्रजनन के तीन दिन के अन्दर इसके लक्षण दिखाई देते है जिसमे पशु के शरीर का तापमान कम हो जाता है पशु बेचैन रहता है उसके शरीर में अकडन आ जाती है जिस से वो टिक से चल फिर नही पता है और एक तरफ अपनी गर्दन लटकाए बैठा रहता है। यदि हम उसके सिर और गर्दन को सीधा करते है तो भी वह फिर से उसी ओर मोड़ के बेट जाता है

11 सुखा रोग (john disease)

यह भी एक संक्रमित रोग है जो " वैसीलस " नामक कीटाणु से लगता है इस रोग में ये जीवाणु पशु की लार गोबर मूत्र आदि के माध्यम से बाहर निकलते रहते है इस रोग का पता बहुत ही धीरे से चलता है इस रोग में पशु सुस्त रहता है उसके शरीर में खून की कमी हो जाती है पतला पतला गोबर करता है उसके जबड़े के नीचे सूजन रहती है इस रोग से पशु साल भर में मर जाता है

12 पशु में चेचक रोग (cow pox )

इस रोग में पशु के शरीर का तापमान ज्यादा हो जाता है एवं पशु के शरीर पर फफोले जैसे दाने दिखने लगते है यह रोग अधिकतर गाय और बेल में होता है भैस पर इसका असर बहुत ही कम होता है यह रोग बकरियों और भेडो के मेमनों को भी अधिक प्रभावित करता है जिसमे उनके शरीर के नाज़ुक भाग पहले प्रभावित होते है जैसे आँखो के चारों तरफ का भाग जांघों के अंदरुनी हिस्सा ऑतो में सूजन आ जाती है

13 जबड हड्डा एवं कंठजीभा रोग 

जबड हड्डा रोग में में पशु के जबड़े की हड्डी बड जाती है फिर उसमे धीरे धीरे फोड़े होने लगते है और भूख लगने पर भी सही तरीके से खा पी नही पता है। परिणाम स्वरूप पशु कमजोर हो जाता है
कंठजीभा रोग भी जबड हड्डा रोग से मिलता जुलता ही रोग होता है इसमें पशु की जीभ सूज कर कठोर हो जाती है और वो भी खा नही पता है और कमजोर हो जाता है यह दोनों ही रोग पशु की कमजोर हड्डी और जीभ जैसी ग्रथियो को प्रभावित करते है

14 पशु में चर्म रोग- खुजली,गजचर्म,और दाद 

 pashu me Dad khujli charm rog mkd
पशु में चर्म रोग 

मित्रों आपने कई बार पशुओं को दीवार पेड़ आदि से अपने शरीर और सींगों को खुजाते देखा होगा उसे हमें कभी भी नॉर्मली नही लेना चाहिए क्यों की ये गजचर्म हो सकता है इसमें पशु के शरीर के बाल धीरे धीरे उड़ जाते है और जिस जगह ज्यादा खुजली चलती है उस वाह की त्वचा सख़्त हो जाती है और धीरे धीरे वो पुरे शरीर पर फेल जाता है 
दाद भी एक संक्रमित रोग है जो एक पशु से दूसरे पशु में फेल जाता है यह रोग अधिकतर बरसात के बाद  में होता है यह रोग गंदगी और नमी के कारण होता है इसमें रोगी पशु के शरीर पर गोल गोल दाग चस्ते पड़ जाते है जिससे पशु को बहुत तेज़ खुजली चलती है फिर उन धब्बों यानि दाद के चारों तरफ छोटी छोटी फुंसियां हो जाती है और उन मे से पानी निकलने लगता है यदि वो अन्य पशु को लग जाये तो वो भी इस बीमारी की चपेट में आ जाता है
मित्रों आज की पोस्ट में हमने कुछ ही रोगों के बारे में जिक्र किया है अगली पोस्ट यानि भाग 2 में बाकी बीमारियों के बारे में लिखेंगे उसके उन सभी पशु रोगों के उपचार ओर उनसे बचाव के तरीकों पर पोस्ट लिखेंगे इस लिए आप माय किसान दोस्त पर विजिट  करते रहे
हेल्लो दोस्तों में कोई वैज्ञानिक या पशु चिकित्सक नही हु में भी एक छोटा सा किसान हु मेरा इस webside पर जानकरी देने का एक मात्र उद्देश्य किसान भाइयों की हेल्प करना हैयदि आपके पास भी इसी कोई जानकारी हो जिससे किसान भाइयों को लाभ मिल सके तो मुझे ज़रुर लिखे उसे में आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित करुँगा यह सब जानकारियां आप जैसे अच्छे मित्रों द्वारा दी जाती है यदि इस साइड में दी गयी जानकारी में कोई ग़लती हो या आपका कोई सुझाव हो तो मुझे ज़रुर बताये में आपका आभारी रहुगा !

पशु रोगों की पहचान भाग 2 यहाँ पढ़े ⇐

        -------- जय किसान जय भारत ------

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Sunday, December 18, 2016

Unknown

पशुओ में अफारा रोग होने पर उनका उपचार केसे करे। pashu me afaara rog

pashuo me afara rog hone par kya kre puri jankari

hello नमस्कार dosto  आज की इस पोस्ट में हम अफ़रा रोग क्या होता है। और इसका इलाज  पशुपालक कैसे करे इस बारे में पूरी जानकारी बताएंगे।

 पशु में अफ़रा रोग क्या होता है। परिचय:-

 अफ़रा पशुओं में आमतौर और अचानक होने वाली बीमारी होती है।यह रोग पशुओं में अधिक खाने या दूषित खाने के कारण होता है। इस रोग में पशु के पेट में aciditi अमोनिया,कार्बनडाई ऑक्साइड,मीथेन आदि दूषित गैस बन जाती है। इस गैस का दबाब छाती पर पड़ता है। और पशु को सास लेने में तकलीफ़ होती है। और पशु बेचन हो कर बेट जाता है या एक साइड लेट जाता है। पैर पटकने लगता है। यदि इस अवस्था में तुरंत इलाज नही किया जाये तो पशु कुछ घंटो में मर जाता है।
pashu me afaara rog hone par elaz mkd
पशु में अफ़रा रोग का इलाज़ 

अफ़रा रोग के प्रमुख लक्षण:-

 पशुओं में अफ़रा रोग की पहचान करने के लिए पशु पालक को निम्नलिखित लक्षणों का ध्यान रखना चाहिए।
 ⇒ पशु को सास लेने में कठिनाई होना। 
⇒ जुगाली करना बंद कर देना।
 ⇒ पशु का पेट बायें और अधिक फूल जाना। 
⇒ खाना और पानी पीना बंद कर देना।
 ⇒ ज़मीन पर लेट कर पाँव पटकना।
 ⇒ पशु के फूले हुए पेट पर धीरे धीरे देने से ढ़ोल जैसी डब डब आवाज़ करना। 
⇒ पेशाब मल त्याग बंद कर देना। 

अफ़रा रोग किन किन कारणों से होता है:-

 पशुओं में अफ़रा रोग का सीधा सम्बन्ध उसके खान पान से होता है। 
➤ खाने में अचानक बदलाव करना।
➤अत्यधिक मात्रा में हरा और सुख चारा एवं दाना खा लेना।
➤ बरसात के दिनों में कच्चा चारा अधिक मात्रा में खा लेना।
 ➤ गर्मी के दिनों में उचित तापमान न मिलना और पाचन क्रिया गड़बड़ाना और अपच हो जाना।
 ➤ चारे भूसे के साथ कीड़े और जहरीले जानवर खा जाना।
 ➤ बरसात के दिनों में दूषित पानी पी लेना।
➤ बिनौले जैसे तैलीय आहार का देना।
➤ हरा चारा बरसीम को खेत से काटकर सीधे पशु को खिलाना
➤ नए भूसे को अधिक मात्रा में देना।
 ➤गेहू मक्का आदि अनाज ज्यादा मात्रा में खाने से।

 अफ़रा रोग से बचाव के लिए क्या क्या करना चाहिए:-

 पशु पालक निम्नलिखित बातों का ध्यान रख कर पशु को अफारे से बचा सकता है। 
➥चारा भूसा आदि खिलाने से पहले पानी पिलाए।
 ➥प्रतिदिन पशु को खुला चरने देवे। 
➥ दूषित चारा दाना भूसा और पानी न पिलाये  ।
 ➥ हरा चारा जैसे बरसीम ज्वार रजका बाजरा काटने के बाद कुछ समय पड़ा रहने दे उसके बाद खिलाये।
 ➥ पशु को लगातार भोजन ना दे कम से कम 20 मिनट का अन्तराल जरूर दे।
 ➥ हरा चारा पूरी तरह पकने के बाद ही खिलाये।
 ➥ अचानक पशु के खान पान में परिवर्तन नही करे।
 ➥ पशु को चारा खिलाने के बाद तुरंत जोतना नही चाहिए 
 ➥ मौसम में बदलाव होने पर पशु के लिए उचित तापमान की व्यवस्था करे। 

अफ़रा होने पर घरेलू तरीके से प्राथमिक उपचार कैसे करे:-

 पशुओं में अफ़रा एक जानलेवा बीमारी होती है। जहाँ तक हो सके जल्दी से जल्दी पशु चिकित्सक को बताना सबसे बेस्ट रहता है। लेकिन यदि पशु चिकित्सक के आने में ज्यादा समय लगता हो तो आप पशु को प्राथमिक उपचार के लिए नीचे बताये गये उपचार में से कोई भी उपचार कर के पशु को बचा सकते है।
 1 सबसे पहले पशु को बैठने ना दे उसे टहलाते रहे(घुमाते फिरते)
 2 एक लीटर छाछ में 50 ग्राम हींग और 20 ग्राम काला नमक मिला कर उसे पिलाए।
 3 सरसों अलसी या तिल के आधा लीटर तेल में तारपीन का तेल 50 से 60 मी.ली. लीटर मिला कर पिलाये।
 4 घासलेट यानि मिटटी के तेल में सूती कपड़े को भिगो कर उसे सुघाये
 5 आधा लीटर गुन गुने पानी में 15 ग्राम हींग घोल कर नाल द्वारा पिलाये।
 6 पतली सुई द्वारा पेट की गैस बहार निकले(यह कार्य सावधानी पूर्वक करना चाहिए पूरी जानकारी नही होने पर न करे।) 

पशु में अफ़रा होने पर अन्य अफ़रा नाशक औषधिया 

 ऊपर दिए गये पशु के अफ़रा के घरेलू उपचार थे अब कुछ दवाइयाँ भी पशुपालक को अपने पास रखनी चाहिए ताकि समय पर उचित इलाज हो सके।
 अफ़रा नाशक दवाइयों के नाम anti-bloats
 1 Afron एफ़्रोन 
 इस दवाई में सोडाबाइकार्ब,हींग,मरीच,जिंजिबर होता है। यह बड़े पशुओं को जैसे बेल भैस आदि को एक लीटर गुननुने पानी में 50 ग्राम मिलकर नाल दुवारा दिया जाना चाहिए।
 2 GARLILL
गार्लिल इस दवाई में हींग,कुटचा,सागर गोटा,प्रवाल पिष्टी,इंद्रा जो,लहसुन,उपलेट आदि होते है यह पाचन क्रिया में गड़बड़ी होने पर लाभदायक है। इसे 10 ग्राम मुँह के द्वारा देवे। 
3 TIMPOL टीम्पोल
यह भी एक आयुर्वेदिक दवाई है। इसे 25 से 80 ग्राम गुनगुने पानी या LINSID तेल के साथ दिन में दो बार दे।
 4 TYMPLAX टाईम्पलेक्स
यह पेट में वायु गोला अफ़रा आदि में काम आती है। 100 मी.ली.मुख द्वारा पिलाए।
 Note:- किसी भी दवाई या तरीके का उपचार पशु पर करने से पहले उसके रोगों की पहचान करना अतिआवश्यक होती है। कोई भी दवाई देने से पहले अपने पशु चिकित्सक की सलाह अवश्य ले।
 दोस्तों मैंने पूर्ण रूप से प्रयास किया है। की आपको पशु में होने वाले अफ़रा रोग की पूरी जानकारी एवं उपचार के तरीके बताऊँ यदि यदि कोई उपाय बाकी रह गया हो तो आप उसे कॉमेंट में जरूर लिखे ताकि आपके कॉमेंट को पढ़कर अन्य पशुपालक किसान दोस्तों को फ़ायदा हो सके। 
आपकी राय और सुझाव सदेव आमंत्रित है। यदि आपको इस तरह की जानकरी पसंद आयी हो तो आप इसको अपने मित्रों में शेयर जरूर करे शेयर करने के लिए नीचे दिए गये बटन का उपयोग करे।
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Saturday, August 6, 2016

Unknown

अच्छी नस्ल के दुधारू पशु कहा से ख़रीदे। डेयरी फार्म के लिए गाय भेस कहा पर मिल सकते है

Indian cow best qwality
अच्छी नस्ल के पशु कहा से खरीदे।
नमस्कार माय किसान दोस्तों खेती के साथ साथ पशु पालन के बारे में भी हम पोस्ट लिखते रहते है। क्यों की पशु पालन भी किसानों की आय का एक बिढ़िया ज़रिया है। पिछले दिनों आपने वो खबर तो सुनी ही होगी की गिर गाय के मूत्र से सोना निकलता है। उस खबर के बाद my kisan dost पर जुड़े कई सारे दोस्तों ने फेसबुक और ईमेल के जरिये कई सारे सवाल पूछे गये। जो सबसे ज्यादा पूछे गये सवाल थे वो
1 भारतीय नस्ल की अच्छी गाय कहा मिलेगी ?  
2 गिर नस्ल की गाय कहा मिल सकती है ? 
3 डेयरी के लिए दुधारू पशु कहा से खरीदे ?
आज की इस पोस्ट में में कोशिस करुँगा की आपके सवालों के जबाब आपको मिल जाये यदि और भी कुछ आपके सवाल हो तो हमें commnet में जरूर पूछे।
भारतीय गाय में 30 प्रकार की नस्ल पायी जाती है। यहाँ पढ़े।बहुत सारी नस्लों की गाये विलुप्त होती जा रही है। और उनकी संख्या भी लगातार घटती जा रही है। और जो बची हुई है। वो भी अशुद्ध नस्ले बनती जा रही है। क्यों की उनके हिट पर आने वाले समय पर उसी नस्ल के सांड का नही मिल पाना या अन्य तरीके से उन्हें गर्भ धारण करवाना आदि कई कारण से भारतीय नस्ल की गाय की संख्या कम होती जा रही है।

 अच्छी नस्ल की भारतीय गाय कहा कहा से ख़रीदे ? 

 सबसे पहले तो हमें जिस नस्ल की गाय चाहिए उसकी पूरी जानकारी होना आवश्यक होता है। उसका वजन रंग शरीर खान पान दूध शारीरिक संरचना उसकी उत्पत्ति का स्थान आदि।क्यों की आज कल पशुओं का व्यापार करने वाले लोग किसी भी नस्ल को कुछ भी बता कर बेचने में माहिर होते है। पशु की नस्ल की जानकारी के लिए आप अपने पशु पालन विभाग के अधिकारियों से या विरिष्ट पशु चिकित्सक से उसके रूप रंग आकर की जानकारी ज़रुर ले ले इसके अलावा आप inter net के माध्यम से या अन्य तरीके से जानकारी लेने के बाद ही पशु खरीदने जाए। अच्छी नस्ल के पशु कहा से ख़रीदे उसके लिए हम इन विकल्प का उपयोग कर सकते है।

1 पशु हाट पशु मेले:- 

आप अगर पशु जैसे गाय बेल बकरी भैस आदि खरीदना चाहते है। तो पहले अपने क्षेत्र के पशु हाट में तलाश करे अगर आपको जिस तरह की नस्ल का पशु चाहिए वो उस हाट में मिल जाता है। तो अच्छा है क्यों की परिचित से पशु खरीदने पर आपको धोखे की सम्भावना कम हो जाती है। इनके अलावा आप भारत में कई बड़े बड़े पशु मेलों का आयोजन होता है। वहां भी आपको अच्छी नस्ल के और दुधारू पशु मिल सकते है। में यहाँ पर उन मुख्य मेलों के बारे में sort में बता देता हु। 
बिहार के सोनपुर पशु मेला 
यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। जिसमे बहुत सारी नस्ल के पशु आते है इस मेले का आयोजन बहुत बड़े पैमाने पर होता है
मेला- नवम्बर दिसम्बर माह में लगता है।
राजस्थान का पुष्कर पशु मेला
अजमेर के पास पुष्कर में राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। जिसमे दूर दारज के राज्यों के लोग पशु खरीदने बेचने आते है। यहाँ पर भी आपको अच्छी नस्ल के पशु उपलब्ध हो जाते है। गिर गाय भी यहाँ मिल जाती है।
मेला-कार्तिक की पूर्णिमा को यह मेला लगता है।
नागौर का पशु मेला
राजस्थान के नागौर में लगता है यहाँ भी बहुत से राज्यों के व्यापारी पशु खरीदने बेचने आते है।
मेला-जनवरी फरवरी माह में लगता है।
कोलायत पशु मेला 
राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला है।इसका आयोजन दिसम्बर माह में किया जाता है।
नागपुर का पशु मेला 
यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला है। यहाँ अक्सर बहुत से मेले लगते रहते है इस मेले का आयोजन जनवरी फरवरी में होता है।
आगरा का पशु मेला
आगरा के पास बटेश्वर शहर में ये मेला कार्तिक माह में लगता है।
झालावाड़ पशु मेला 
इस मेले का आयोजन झालावाड़ के पास झालापाटन में किया जाता है इस मेले में गाय बेल भैस ऊँट की बिक्री बड़े पैमाने पर होती है इसका आयोजन कार्तिक माह में किया जाता है।
साहिवाल जाती की गाये प्राय पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,बिहार,दिल्ली मध्यप्रदेश में पायी जाती है।आप इन्हें अम्रतसर,जालंधर,हिसार,गुरदासपुर,करनाल,कपूरथला,फिरोजपुर,अन्होरदुर्ग(mp)लखनव,मेरठ,बिहार पश्चिम बंगाल के पशु हाट पशु मेलों से ख़रीद सकते है।

2 पशु विक्रय केंद्र 

भारत में इसी कई बड़ी गो शालाए है जहा अच्छी नस्ल की गाय और अन्य पशु वहा आपको उपलब्ध हो जायेगे
आप गिर गाय खरीदने के लिए गुजरात की गो शाला में सम्पर्क कर सकते है
1 gou vishvkosa 
2 aravli gir cow
3 khuran dary form hariyana
इसी कई सारी diary farming side पर भी आप तलाश कर सकते है।

3 online गाय खरीदने बेचने के लिए

अच्छी नस्ल के दुधारू पशु की खरीदी बिक्री के लिए अभी भारत सरकार ने भी इस  और कदम बढ़ाया है। कृषि मंत्री श्री राधा मोहन जी ने ई पशु हाट पोर्टल की शुरुआत करी है। इस नई webside www.epashuhaat.gov.in के जरिये विभिन्न नस्ल की गाय भैस और उनके भूण आदि प्राप्त किये जा सकते है।इस webside पर किसानों को ऑनलाइन सौदे करने और पशु को उनके घर तक पहुचाने की सुविधा है। अभी यह webside अँग्रेजी में है जल्द ही इसे हिंदी और अन्य भाषाओं में भी देख सकेंगे।इस पोर्टल के जरिये सरकार का उद्देश्य एक अधिकृत online pashu haat बनाना है। ताकि पशुपालकों को रोग मुक्त अच्छी नस्ल के पशु उपलब्ध हो सके इस webside पर जाने के लिए नीचे लिंक को open करे।
ऑनलाइन पशु गाय भैस की जानकारी देखना या खरीदना चाहते हो तो india mart,Olx, Quikr पर भी आपको मिल जाएगी 

अन्य स्रोत

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में दो अच्छे पशु हाट लगते है।
धुन्धडका- रविवार के दिन हर सप्ताह
जाहडा-सोमवार के दिन हर सप्ताह
इनके अलावा आप हरियाणा पंजाब के कई सारे डेयरी फार्म पर भी आपको अच्छी नस्ल की गाय भैस मिल जाएगी
पंजाब राज्य में खरड कुराली शहर के पास एक शाहपुरा गाँव है। जहाँ पर खालसा डेयरी फार्म पर भी आपको अच्छी नस्ल के पशु उपलब्ध हो जाते है।इन डेयरी फर्मो में अच्छी नस्ल के पशु तैयार किये जाते है। इनके अलावा यदि आपके पास भी कोई अच्छा विकल्प हो तो हमें comment में ज़रुर लिखे ताकि बाकी किसान भाइयों को भी उसका लाभ मिल सके।
हमसे जुड़े रहने के लिए आप हमारा fb ग्रुप my kisan dost और हमारा फेसबुक पेज
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Thursday, July 28, 2016

Unknown

भारतीय नस्ल की गाय की जानकारी और उनकी विशेषताए Indian breed of cow

नमस्कार किसान भाइयों
आपने थोड़े समय पहले पेपर और टीवी पर ये news तो सुनी ही होगी की गिर गाय के मूत्र में सोने के कण मिले ले। जिसका रिसर्च जुनागड़ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विज्ञानिकों ने गिर नस्ल की 400 गायो के मूत्र परीक्षण के बाद पाया की 1 लीटर मूत्र में 3 मिली ग्राम से ले कर 10 मिली ग्राम तक सोने के कण पाए गये है। इसकी पुष्टि विज्ञानिकों ने करी है।
गाय का दूध अमृत के समान होता है। जो कई तरह के शारीरिक रोगों से लड़ने में मदद करता है। जिसका महत्व प्राचीन समय से ही वेदों और ग्रंथों में लिखा गया है। 
हिन्दू धर्म में गाय को पूजनीय और पवित्र माना जाता है। 

भारतीय गाय Indian cow:-

indian cow prjati
भारतीय नस्ल की गाय 

भारत में गायो की 30 प्रकार की नस्ले पायी जाती है आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन्हें 3 भागों में विभाजित किया गया है।
1 अच्छा दूध देने वाली लेकिन उसकी संतान खेती के कार्यो में अनुपयोगी 
                दुग्धप्रधान एकांगी नस्ल 
2 दूध कम देती है लेकिन उसकी संतान कृषि कार्य के लिए उपयोगी
                वत्सप्रधान एकांगी नस्ल 
3 अच्छा दूध देने वाली और संतान खेती के कार्य में उपयोगी 
                सर्वांगी नस्ल 
नोट संतान खेती में उपयोगिता से आशय उनके बछड़े बेल बनने के बाद गाड़ी खींचना जुताई हल चलाना आदि से है 

भारतीय गायो की प्रजातिया  :-  

सायवाल जाती 
यह प्रजाति भारत में कही भी रह सकती है। ये दुग्ध उत्पादन में अच्छी होती है।इस जाती के गाये लाल रंग की होती है। शरीर लम्बा टांगे छोटी होती है। छोड़ा माथा छोटे सिंग और गर्दन के नीचे त्वचा लोर होता है। इसके थन जुलते हुए ढीले रहते है।इसका औसत वजन 400 किलोग्राम तक रहता है। ये ब्याने के बाद 10 माह तक दूध देती है। दूध का औसत प्रतिदिन 10 से 16 लीटर होता है। ये पंजाब में मांटगुमरी, रावी नदी के आसपास और लोधरान, गंजिवार, लायलपुर, आदि जगह पर पायी जाती है।
रेड सिंधी
इसका मुख्य स्थान पाकिस्तान का सिंध प्रान्त माना जाता है। इसका रंग लाल बादामी होता है। आकर में साहिवाल से मिलती जुलती होती है। इसके सिंग जड़ों के पास से काफी मोटे होते है पहले बाहर की और निकले हुए अंत में ऊपर की और उठे हुए होते है।शरीर की तुलना में इसके कुबड बड़े आकर के होते है। इसमें रोगों से लड़ने की अदभुत क्षमता होती है  इसका वजन औसतन 350 किलोग्राम तक होता है। ब्याने के 300 दिनों के भीतर ये 200 लीटर दूध देती है।
गिर जाती की गाय 
इसका मूल स्थान गुजरात के काठियावाड का गिर क्षेत्र है।इसके शरीर का रंग पूरा लाल या सफेद या लाल सफेद काला सफेद हो सकता है।इसके कान छोड़े और सिंग पीछे की और मुड़े हुए होते है। औसत वजन 400 किलोग्राम दूध उत्पादन 1700 से 2000 किलोग्राम तक हो माना गया है।
थारपारकर 
इसकी उत्पत्ति पाकिस्तान के सिंध के दक्षिण पश्चिम  का अर्ध मरुस्थल थार में माना जाता है।इसका रंग खाकी भूरा या सफेद होता है। इसका मुँह लम्बा और सींगों के बीच में छोड़ा होता है। इसका औसत वजन 400 किलोग्राम का होता है।इसकी खुराक कम होती है औसत दुग्ध उत्पादन  1400 से 1500 किलोग्राम होता है।
काँकरेज 
गुजरात के कच्छ से अहमदाबाद और रधनपुरा तक का प्रदेश इनका मूल स्थान है।ये सर्वांगी वर्ग की गाये होती है। इनकी विदेशों में भी काफी मांग रहती है।इनका रंग कला भूरा लोहिया होता है।इसकी चाल अटपटी होती है इसका दुग्ध उत्पादन 1300 से 2000 किलोग्राम तक रहता है।
मालवी 
ये गाये दुधारू नही होती है इनका रंग खाकी सफ़ेद और गर्दन पर हल्का कला रंग होता है। ये ग्वालियर के आसपास पायी जाती है।
नागोरी 
ये राजस्थान के जोधपुर इनका प्राप्ति स्थान है। ये ज्यादा दुधारू नही होती है लेकिन ब्याने के बाद कुछ दिन दूध देती है।
पवार 
इस जाती की गाय को गुस्सा जल्दी आ जाता है। ये पीलीभीत पूरनपुर 
खीरी मूल स्थान है। इसके सिंग सीधे और लम्बे होते है और पुंछ भी लम्बी होती है इसका दुग्ध उत्पादन भी कम होता है।
हरियाणा
इसका मूल स्थान हरियाणा के करनाल, गुडगाव, दिल्ली है।ये ऊंचे कद और गठीले बदन की होती है। इनका रंग सफेद मोतिया हल्का भूरा होता है
इन से जो बेल बनते है  वो खेती के कार्य और बोज धोने के लिए उपयुक्त होते है। इसका औसत दुग्ध उत्पादन 1140 से 3000 किलोग्राम तक होता है।
भंगनाडी 
ये नाड़ी नदी के आसपास पाई जाती है। इसका मुख्य भोजन ज्वार पसंद है। इसको नाड़ी घास और उसकी रोटी बना कर खिलाई जाती है। ये दूध अच्छा देती है।
दज्जाल
ये पंजाब के डेरागाजीखा जिले में पायी जाती है  उसका दूध भी कम रहता है।
देवनी 
ये आंध्र प्रदेश के उत्तर दक्षिणी भागों में पायी जाती है ये दूध अच्छा देती है और इसके बेल भी खेती के लिए अच्छे होते है।
निमाड़ी 
नर्मदा घाटी के प्राप्ति स्थान है। ये अच्छी दूध देने वाली होती है।
राठ 
ये अलवर राजस्थान की गाये है ये खाती कम है और दूध भी अच्छा देती है।
अन्य प्रजाति की गाये 
गावलाव
अगॊल या निलोर 
अम्रत महल -वस्तप्रधान गाय 
हल्लीकर - वस्तप्रधान गाये 
बरगुर  -     वस्तप्रधान गाये 
बालमबादी -वस्त प्रधान गाये 
कगायम - दूध देने वाली गाये 
 क्रष्णवल्ली - दूध देने वाली गाय
किसान भाई ये important aartical भी पढ़े।

* नील गाय से खेत में लगी फसल को कैसे बचाए।

* अपने खेत पर प्याज़ का बीज कैसे बनाये।

* कैसे पता करे की आपकी फसल को कौनसा खाद् चाहिए।

* प्याज़ और लहसुन का भंडारण कैसे करे।

* dawsing क्या है इससे जमीन में पानी का पता कैसे लगते है।

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Saturday, July 16, 2016

Unknown

Ghar par pashuo ke liye saileg kese banaye! पशु के लिए साइलेज केसे बनाये।

हरे चारे से पशुओं के लिए साइलेज कैसे बनाए!

pasho ke liye postik aahar

Hello freind aaj kheti ke sat sat pashupalan bhi ek profit wala व्यवसाय kisano ke liye ban gya hai.
pashu palan ke bhut sare faide kisano ko milte hai जैसे:- sabhi tarha ki khaad banane ke liye gobar गोमूत्र  or dudh aadi hame pashuo se milta hai.
pashu palan sabhi kisan krna chahte hai lekin unke samne sabse badi samshya pashuo ke liye पर्याप्त चारे,भूसे or pashu aahar ki aati hai.
to aaj hum sikhege ki pashu palak साइलेज kese banaye taki sal bhar pashuo ko postik aahar milta rhe.

   साइलेज क्या होता है :-

jis tarha apne ghar pr हरा धनिया, मेथी, पुदीना aadi ko halki dhup me sukha kr rakhte hai taki jab wo na mile to uska upyog kr sake. usi tarha pashuo ke liye hare chare ko surkshit kr pure sal pashuo ke khane ke liye rakhne ko hi saileg kaha jata hai.

  साइलेज किन किन फसलो का बनाया जा सकता है:-

 saylej banane ke liye hare chare ka upyog hota hai. jiske liye hare chare wali fasle jese makka,jawar,bajara, mithi sudan ghass or jai aadi faslo ka best saileg banaya ja sakta hai.
eske alawa barsim,rajka,lobiya aadi ka bhi bana sakte hai pr inme pani ki matra adhik hone ke karan accha साइलेज nhi ban pata fir bhi kuch upay kr inse bhi banaya jata hai.

Saileg बनाने की क्या विधि है :-

Saileg banane ke liye sabse pahle pashuo ki संख्या chara ki matra or khadde ke sthan tay kr ke banana chahiye. Fir hare chare jese makka jawar bajara aadi ko kuti krne wale yantra se barik tukde krne chahiye jis se hara chara jaldi sukh jaye. Use etna sukhaye ki भंडारण krne pr usme fafund peda na ho.aam tor par saileg banane ke liye chare me shushk pardarth ki nami 30 se 40 %tak rahni chahiye. Saileg banane wale ghulnshil me khamir banane ki kirya hote samy अम्ल  P.H  4.2. Kafi matra me rahe or wo chare ko kharab hone se bachahye makka aadi se saylej banate time 500 garam uria yadi प्रति क्विंटल me milaya jaye to saileg me प्रोटीन ki matra bad jati hai.

साइलेज के लिए गड्डा किस तरह का होना चाहिए :-

साइलेज banane ke liye gadde ka chunaw ke liye upar uthi hui jagha or dalan wali jagha upyukt rahti hai 45 क्विंटल hare chare se sailej banane ke liye लम्बाई 10 फिट चौड़ाई 5 फिट  or गहराई 6 फिट
Rakhni chahiye 45 क्विंटल hare chare ko 2 majdur 3, 4 din me bhar sakte hai us saileg ko प्रतिदिन dudharu pashu ko 15 se 20 kg khilane pr ye 2 या 3 mahine tak chal jata hai.gadde ki diwale bilkul sidhi or समतल or kone gol hone chahiye kacche bane hue gadde me सतह pr प्लास्टिक ka पुआल dal kr diwalo pr bhi charo or acche se puaal dal de taki gadde me hawa or pani na ghus paye.fir gadde me toda chara dale or use pero se acche se dabaye taki usme hawa na rah paye yadi usme uria dal rhe ho to uria ka gol bana kr us pr ek saman chidkaw krte jaye fir esi tarh se pura gadda bhare gadda jamin se 2 ya 3  फिट tak upar uthaye fir use paastik ke pual se sab tarf se acche se ढाक de or kinaro ko mitti se daba de taki pani or hawa uske undar na ja sake saileg lagbhag 2 month me puri tarha tayar ho jata hai.

साइलेज बनाने के बाद की सावधानिया :-

* Acchi tarha se bana hua saileg ka rang halka bhura or goldan hota hai.
* Acche saileg me ek vishesh prkar ki khusbu aati hai.
* Saileg pashuo ke pachane me or khane me aasani hoti hai.
* Gadde ka muh kholne ke bad saileg ko lagatar pashuo ko khilana chahiye.
* फफूंद laga hua साइलेज pashu ko nhi khilana chahiye.
* Acche saileg me कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन ki matra hoti he jo dudh ka utpadan badati hai.

पशुपालक और किसान भाई ये पोस्ट भी जरूर पढ़े।


* घर पर पशु आहार केसे बनाये !

* कैसे पता करे की आपकी गाय या भैस बीमार तो नही है 

* नवजात बछड़े बछडियो का पोषक आहार कैसे देवे 

* लहसुन पर लगने वाले रोग और उनका उपचार 

* बिना खेत के खेती कैसे करे जानकारी 

My kisan dost पर दी गयी जानकारी आपको केसी लगती है। आप हमें comment में जरूर बताये और लगातार update पाने के लिए फ्री में email subcraibe जरूर करे।
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