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Wednesday, March 1, 2017

my kisan dost

6 best Medicinal plants की खेती करने से किसानों को होगा ज्यादा benefit

दोस्तों आज की दुनिया में सभी अच्छा और ज्यादा पैसा कमाना चाहते है। चाहे वो व्यापारी हो या एक आम  आदमी। किसान भी अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन पोषण करने के लिए दिन रात कड़ी मेहनत करता है। ताकि ज्यादा पैसा और benefit ले सके। लेकिन यदि वह Traditional और पुराने तरीके से खेती करेगा तो आज के युग में पिछड़ जायेगा। इसलिए उसे हर उस नये तरीके और खेती को अपनाना पड़ेगा जिससे उसकी आय बढ़ सके। कम खर्च में अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए भारत में कुछ वर्षो में औषधीय फसलो Medicinal farming की तरफ किसानों का रुख बढ़ा है। और इस तरह की खेती कर कई सारे किसान माला माल भी हुए है। और इन औषधीय पोधों की खेती कारण बेकार पड़ी बंजर और पहाड़ी इलाकों में भी खेती करना सम्भव हो पाया है।
आज हम कुछ ऐसी 6 बेस्ट औषधीय फसलो 6 best Medicinal plants के बारे में संक्षिप्त में जानकारी देंगे जिसमे stevia,aarimishiya,lemon grass,shatavari,tulsi,alovera की खेती मार्केटिंग  और ट्रेनिंग के बारे में जानेंगे।  इसलिए लास्ट तक पूरी पोस्ट पढ़े। 

 6 बेस्ट औषधीय फसलो की खेती के बारे में जानकारी 

best medicinil plant farming
medicinal plant farming

1 stevia ki kheti 

स्टीविया एक लोकप्रिय और लाभदायक औषधीय पौधा है। यह पौधा अपनी पत्तियों की मिठास के कारण जाना जाता है। इतना मिटा होने के बाद भी इसमें शर्करा  की मात्रा नही होती है। यह एक शून्य कैलोरी उत्पाद है। यह मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिका में अधिक पाया जाता है। यह मधुमेह वाले रोगियों के लिए काफी लाभदायक माना जाता है। यह रोगी के शरीर में इंसुलिन बनाने में मदद करता है। इसकी बढ़ती माँग को देखकर विश्व के कई देशों जैसे जापान,अमेरिका,ताइवान,कोरिया,आदि में इसकी व्यावसायिक तौर पर इसकी खेती की जा रही है। भारत में भी मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,गुजरात,झारखंड आदि कई सारे राज्यों में इसकी खेती की शुरुआत हो चुकी है। स्टीविया की खेती के लिए अर्द्ध आर्द्र और अर्द्ध उष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। india में इसकी खेती पूरे साल में कभी भी कर सकते है। बस जिस क्षेत्र का तापमान शून्य डिग्री से नीचे जाता हो वहाँ इसकी खेती नही करना चाहिए। 
इसकी अच्छी पैदावार के लिए दोमट जमीन जो 6ph से 7ph के अंदर होनी चाहिए एवं उचित जल निकास वाली होना चाहिए। यह फसल सूखा सहन नही कर सकती इसलिए इसकी सिंचाई 10 दिनों के अंतराल में करना चाहिए। साल भर में इसकी 3 से 4 कटाई होती है उस कटाई में 60 से 90 क्विंटल तक सूखे पत्ते प्राप्त किये जा सकते है। यदि हम इनके अन्तर्राष्ट्रीय भाव की बात करे तो 300 से 400 रूपये प्रति किलो ग्राम है। लेकिन भारत में उचित market नही होने पर हम इसका अनुमानित भाव 80 रूपये किलो मान ले तो 60 क्विंटल उत्पादन होने पर 4 से 5 लाख़ रूपये तक की आय प्रति एकड़ हो जाती है। इसकी खेती contacts farming बेस पर ही करना चाहिए ताकि फसल बेचने संबंधित कोई दिक्कत नही आए। 

2 Artimishia ki kheti 

आर्टीमीशिया एक बहुत गुणकारी औषधीय पौधा है। इसका उपयोग मलेरिया की दवाई इंजेक्शन और teblets बनाने में होता है। इसकी खेती चाइना,तंज़ानिया,केन्या आदि देशों में बड़े पैमाने पर की जा रही है। इसकी बढ़ती मांग को देखकर भारत में सीमैप (cimap) ने वर्ष 2005 से इसकी खेती करवाना और ट्रेनिंग देने की शुरूआत की है। इसकी खेती करने के लिए नम्बर दिसम्बर में नर्सरी तैयार करना पड़ती है। और फ़रवरी के माह में इसको खेत में लगाना पड़ता है। इस फसल को बहुत काम खाद् पानी की जरूरत पढ़ती है। इससे को वर्ष में 3 बार  उपज प्राप्त कर सकते है। प्रति बीघे में ढाई से साढे तीन क्विंटल पत्तियां निकलती है। इन पत्तियों को कंपनी 30 से 35 रूपये किलो तक खरीदते है। जिससे किसान को प्रति बीघा 9000 से 10000 तक का फ़ायदा होता है। और अगर हम इसकी लागत को देखे तो मात्र 15 से 20 हजार प्रति एकड़ के हिसाब से आती है। इसके बीज contacts farming कंपनी मुफ्त में उपलब्ध करवाती है। बीज के लिए किसान सीमैप लखनऊ या इफका लेब मध्यप्रदेश से सम्पर्क करे।

3 lemongrass ki kheti 

गर्म जलवायु वाले देश सिंगापुर,इंडोनेशिया,अर्जेंटीना,चाइना,ताइवान,भारत,श्रीलंका में उगाया जाने वाला हर्बल पौधा है। इसकी पत्तियों का उपयोग लेमन ट्री बनाने में होता है। इससे निकलने वाले तेल का उपयोग कई तरीके के सौदर्य प्रसाधन एवं खाद्य में निम्बू की खुशबू (फ्लेवर) लाने के  लिए होता है। भारत में सीमैप CIMAP के जरिए इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसान को पौधे देने के साथ साथ प्रशिक्षण और तेल निकालने से ले कर मार्केटिंग तक की जानकारी उपलब्ध करवाता है। इसकी खेती करने के लिए पहाड़ी क्षेत्र उपयुक्त रहता है। जैसे की राजस्थान के बांसवाड़ा,डूंगरपुर,प्रतापगढ़ आदि 
लैमन ग्रास का पौधा साल भर में तीन बार उपज देता है। हर कटाई करने के बाद इसकी सिंचाई करने से उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। lemon grass की खेती करने के लिए सर्व प्रथम अप्रैल मई माह में इसकी नर्सरी तैयार की जाती है। प्रति हेक्टेयर 10 किलो बीज काफी होता है। जुलाई अगस्त में पौधे खेत में लगाने के लायक हो जाते है। इसके पोधों को क्यारी में 45 से 60 सेमी की दूरी पर लगाए जाते है। प्रति एकड़ में लगभग 2000 पौधे लगाए जा सकते है। इस फसल को बहुत ही काम सिंचाई की जरूरत होती है। काम वर्षा होने पर इसकी सिंचाई आवश्यकता अनुसार कर सकते है। लेमन ग्रास की पहली कटाई 120 दिनों के बाद शुरू हो जाती है। उसके बाद दूसरी और तीसरी कटाई 50 से 70 दिनों के अंतराल में होती है। लेमन ग्रास के छोटे छोटे टुकड़े कर आसवन विधि से तेल निकाला जाता है। प्रति एकड़ में लगभग 100 किलो ग्राम तेल का उत्पादन होता है। जिसकी बाजार में कीमत 700 रूपये किलो से लेकर 900 रूपये किलो ग्राम तक होती है। 

4 satavar ki kheti 


शतावरी को कई नामो से जाना जाता है जैसे शतावरी सतसुता लेकिन इसका वैज्ञानिक नाम एस्येरेगस रेसीमोसा है। इस औषधि का उपयोग शक्ति बढ़ाने,दूध बढ़ाने ,दर्द निवारण एवं पथरी संबंधित रोगों  के इलाज़ के लिए किया जाता है। सतावर की खेती करने के लिए 10 से 50 डिग्री सेल्सियस उत्तम माना जाता है। इसके लिए खेत को जुलाई अगस्त माह में 2-3 बार अच्छी जुताई कर लेना चाहिए। अंतिम जुताई (अगस्त) के समय 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद् प्रति एकड़ मिला लेना चाहिए। फिर 10 मीटर की क्यारी बना कर बीजो की बुआई करना चाहिए। बुआई ले लिए प्रति एकड़ 5 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बाजार में सतावर के बीज का मूल्य 1000 किलो ग्राम तक रहता है। बीज को बोने एक सप्ताह बाद हलकी सिंचाई करे। दूसरी सिंचाई जब पौधे बड़े हो जाये उसके बाद करना चाहिए। सतावर को बहुत ही काम सिंचाई की जरूरत होती है। जब पौधे के पत्ते पिले पड़ जाये तो इसकी खुदाई कर के रसदार जड़ों को निकाल ले। गीली जड़ों का उत्पादन प्रति एकड़ 300 से 350 क्विंटल तक होता है। खेत से निकली जड़ों को अच्छे से सफाई कर के तेज़ धूप में रखना होती है। जब जड़े सुख जाती है तो उनका वजन घटकर 40 से 50 क्विंटल तक रह जाता है। बाजार में इन जड़ों की कीमत 250 से 300 प्रति किलो तक रहता है। सतावर की बिक्री दिल्ली,लखनऊ,कानपुर,बनारस में बड़े पैमाने पर होती है। सतावर के बीज उद्यानिकी विभाग,सीमैप और निजी दुकानों पर आसानी से मिल है। 

5 tulsi ki kheti 

तुलसी  का पौधा प्राचीन समय से ही हर घर के लगया जाता रहा है। तुलसी का पौधा जितना पूजनीय है उससे कई ज्यादा उसमे औषधीय गुण होते है। तुलसी की खेती अब व्यावसायिक रूप में होने लगी है। तुलसी के पत्ते तेल और बीज को बेचा जाता है। तुलसी काम पानी और काम लागत में ज्यादा फ़ायदा देने वाली औषधीय फसल है। भारत में कई सारी राज्य सरकारें तुलसी की खेती करने पर अनुदान भी उपलब्ध करवा रही है। तुलसी के बीज निजी दुकानों और आपके जिले के उधानिकी विभाग में भी आसानी से उपलब्ध हो जाते है। तुलसी के बीज बेचने के लिए मध्यप्रदेश की नीमच मंडी बेस्ट है। नीमच मंडी में सैंकड़ो प्रकार की औषधियों की खरीदी होती है। 
online mandi bhaw देखने के लिए आप लिंक को खोले ⇐ open 
तुलसी की खेती कैसे करे कब सिंचाई करे कौनसा खाद् दे पूरी जानकारी पढ़ने के लिए आप इस लिंक को खोले किसान तुलसी की खेती कैसे करे पूरी जानकारी पढ़े। 

6 alovera एलोवेरा ki kheti 

दोस्तों एलोवेरा कई सारे नामो से जाना जाता है। जैसे घृतकुमारी,ग्वारपाठा,एलॉय आदि। 
एलोवेरा एक औषधीय फसल है। जिसकी खेती भारत के कई सारे राज्यों में हो रही है। एलोवेरा के बारे में हमने बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है जिसमे एलोवेरा की खेती कैसे करे कब सिंचाई करे कब और कैसे उत्पादन ले यदि आपने वो पोस्ट नही पढ़ी तो पहले उसे नीचे दी गयी लिंक को खोल कर जरूर पड़े 
⇨ एलोवेरा की खेती कैसे करे पूरी जानकारी हिंदी में open now ⇦
इस पोस्ट को लिखने के बाद मुझे my kisan dost पर कई सारे सवाल मुझसे कॉमेंट में ईमेल के जरिए और फेसबुक पर पूछे गए में उन सवालों को आपके बीच में शेयर करना चाहुगा ताकि आपको भी benefit मिल सके।  ज्यादा संख्या में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न 
1 एलोवेरा की फसल कितना मुनाफ़ा,लाभ,कमाई होती है ?
ans-
दोस्तों यदि हम एक बीघे के हिसाब की बात करे तो (contect farming के अनुसार)
एक बीघे खेत में क्यारियों में 2 ⅹ 2 फिट की दूरी पर 6000 से 7000 पौधे लगाए जाते है। प्रति पौधा लागत 4 रूपये माने तो 7000ⅹ 4 रूपये =28000 रूपये ख़र्चा (अनु.) 
एलोवेरा का पौधा लगाने के बाद 9-10 माह बाद फसल देने के लायक होता है।  हर्बल कंपनियाँ 3 से 4 रूपये किलो पत्तियां खरीदती है। प्रति पौधे से हमें 3 से 7 किलो तक पत्तियां मिल जाती है। यदि हम एक बीघे में 7000 हजार पोधों से प्रति पौधा मात्र 3 किलो उत्पादन माने तो 7000 ⅹ 3 किलो =21000 किलो ग्राम । 
प्रति किलो 3 रूपये माने तो 21000 ⅹ 3 रूपये =63000 हजार रूपये अब खर्च को घटाए तो 63000-28000 =35000 रूपये शुद्ध मुनाफ़ा प्रति बीघे में उसके बाद भी 3 से 4 बार कटाई साल में होती है। और एलोवेरा को एक बार लगाने के बाद 4-5 सालों तक उत्पादन होता है। 
दूसरा सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल ये की 
2 aloevera ki fasl kaha beche,ग्वारपाठा की मंडी कहा है। एलोवेरा की फसल कौन  खरीदेगा  aloevera market etc.
ans-
 दोस्तों ये सवाल बहुत ही लाज़मी भी है। अगर हम किसी भी फसल की मार्केटिंग के बारे में बिना सोचे उस फसल को लगाएंगे तो नुकसान होना तो निश्चित है। और बहुत से किसानों को नुकसान भी हुआ है। अब जब भी कोई नई फसल आप लगाए तो पहले उसे बेचने के लिए मार्केट जरूर conform कर ले। अब मुद्दे की बात पर आते है भारत में एलोवेरा की seling कहाँ करे तो भारत में सबसे ज्यादा एलोवेरा की खपत करने वाली कंपनियाँ-पतंजलि ,हिमालया,डाबर और भी कई सारी हर्बल कंपनियां है जो की कॉन्टेक्ट फार्मिंग पर पौधे देती है और खरीदती है। आप जिस भी कंपनी से या नर्सरी से पौधे ख़रीदे उसी के साथ बेचने का अनुबंध भी कर ले। किसी भी किसान दोस्त को ऐसी हर्बल कंपनियों के contect no या पते की जरूरत हो तो मुझे आप कॉमेंट या ईमेल अथवा facebook page पर sms कर दे में आपको दे दूँगा। 
इसके अलावा कोई हर्बल कंपनी चाहे तो वो अपना contect no भी पोस्ट कर दे ताकि किसानों को आपसे सम्पर्क करने में आसानी हो (webside की लिंक पोस्ट ना करे सिर्फ text में लिखे link वाले comment publish नही होंगे)
एक और सवाल जो बहुत से किसान भाई पूछते है 
Medicinal plants training kaha se le,औषधीय फसलो की खेती का ट्रेनिंग कहा से ले ?
ans-
इसके जबाब में आप लोगो को बताना चाहूंगा की भारत में औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान सीमैप के जरिये इन औषधीय फसलो पर रिसर्च के साथ साथ किसानों को समय समय पर मार्गदर्शन भी देती है।  यह एक सरकारी संस्था है यह संस्था जानकारी देने के लिए कई मेले,सेमिनार का आयोजन करती है जिसमे किसान सीधे विज्ञानिकों से बातचीत कर सके साथ ही कई सारी लेख सामग्री भी प्रकाशित करती है। यह संस्था पौधे देने के साथ उसकी मार्केटिंग आदि के बारे में भी जानकारी उपलब्ध करवातीं है।  सीमैप का पता - Central Institute of Medicinal and Aromatic Plants
निर्देशक केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान cimap कुकरैल,लखनऊ-उत्तरप्रदेश फोन no 0522-2359623 
CIMAP के चार रिसर्च सेंटर-बैंगलोर,हैदराबाद,पंतनगर,पुरार में है। 
इसके अलावा आप अपने जिले के कृषि विभाग,कृषि विज्ञान केंद्र और उधानिकी विभाग के अधिकारियों और कृषि विज्ञानिकों के सम्पर्क में रहो और जब भी किसी कृषि मेले सेमिनार का आयोजन हो तो उसमे हिस्सा लो इंटर नेट पर कृषि रिलेटेड आर्टिकल पढ़ो एवं  कृषि लेख,पत्र,पत्रिका आदि को पढ़े। 
मैने इस पोस्ट माध्यम से आपको औषधीय Medicinal and Aromatic Plants खेती करने के benefit और marketing के साथ training के बारे में बताया है। यदि इस पोस्ट से जुड़ा आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो हमें comments के जरिए जरूर बताये आप से बात कर के मुझे अच्छा लगता है। 
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Sunday, September 4, 2016

my kisan dost

Aloevera ki kheti kese kre एलोविरा की खेती के बारे में पूरी जानकारी

हेल्लो दोस्तों नमस्कार।
आज की इस पोस्ट में हम

ओषधीय फसल एलोविरा की खेती केसे करे इसके बारे में जानेंगे।

Aloevera ki kheti ke bare me
एलोवीरा का पोधा

परिचय:-

एलोविरा की उत्त्पति का स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है।इसे कई नामो से जाना जाता है। जैसे घृतकुमारी, ग्वारपाटा, अग्रेजी में एलॉय नाम से भी जाना जाता है। ग्वारपाटा के पोधे की ऊचाई 60- 90 से.मी.तक होती है। पत्तो की लम्बाई 30-45 सेमी. तक होती है। पत्ते 4.5सेमी से 7.5सेमी तक होते है। जड़ से उपर सतह के साथ ही पत्ते निकलने लगते है। पत्तो का रंग हरा होता है। और पत्तो की किनारों पर छोटे छोटे काटे जैसे होते है। अलग अलग रोगों के हिसाब से इसकी कई सारी प्रजातिया है।

एलोवीरा का उपयोग:- 

Aloevera में कई सारे औषधीय गुण होते है।इसलिए इसका उपयोग आयुवेदिक में बड़े पैमाने से होता आ रहा है। आज के दोर में कई सारी नेशनल और इंटर नेशनल कंपनियाँ इसका उपयोग चिकित्सा के साथ साथ सौंदर्य प्रसाधन के जैसे फेसवास क्रीम शेम्पू  दन्त पेस्ट अन्य कई सारे product में इसका इस्तेमाल होता है।इसलिए इसकी मांग बडने लगी है। यह पोधा गमले में भी अच्छी तरह से चलता है। मैने भी इसे अपने घर पर लगा रखा है। क्यों की यह जलने पर इसके पत्तो में से गुद्दा और रस लगाने से काफी ज्यादा relif मिलती है।कई सारे लोग इसे मकानों की छत और gardan में शोकियाना तोर पर भी लगाते है। इसकी बढती मांग की वजह से इसकी खेती व्यावसायिक रूप में शुरू हो गयी है।

Aloevera ki kheti kese kre 

एलोवीरा की खेती के लिए khet की तैयारी:-
वेसे एलोविरा के पौधे किसी भी प्रकार की उपजाऊ अनुपजाऊ मिट्टी में आसानी से उग जाते है।बस आपको बस एक बात का ध्यान रखना है की पोधा अधिक जल भराव और पाला पड़ने वाली जगह पर नही लगाना है।सबसे पहले खेत की 2 बार अच्छे से जुताई कर उसमे प्रति हेक्टेयर 10 से 20 टन के बीच में अच्छी पकी हुई गोबर की खाद डाले साथ में 120 किलोग्राम यूरिया+150किलोग्राम फास्फोरस+30किलोग्राम पोटाश इनको खेत में समान रूप से बिखेर देवे फिर एक बार हलकी जुताई करा के पाटा लगा कर मिट्टी को समतल बना ले। फिर खेत में 50×50 सेमी. की दूरी पर उठी हुई क्यारी बना ले।
पोधो की रोपाई एवं रखरखाव:- 
पोधो की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए जून जुलाई और फरवरी से मार्च के बीच कर सकते है। एलोवीरा की रोपाई प्रकंदों से होती है इसलिए उनकी लम्बाई 10 से 15 सेमी के होने चाहिए। अच्छी उपज के लिए अनुशासित किस्में  सिम-सितल एल 1,2,5 और 49 है।जिसमे जेल की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। प्रकंदों की दुरी 50×50 रख के बीच में दुरी 30सेमी की रख कर रोपाई करनी चाहिए।

घर्तकुमारी की सिचाई:- 

सालभर में इसे मात्र 4 या 5 बार सिचाई की आवश्यकता होती है। सिचाई के लिए स्प्रिकलर और ड्रीप प्रणाली अच्छी रहती है। इससे इसकी उपज में बढ़ोत्तरी होती है।गर्मी के दिनों में  25 दिनों के अंतराल में सिचाई करनी चाहिए।
निदाई गुड़ाई:- 
खतपतवार की स्थिति देख कर निदाई गुड़ाई आवश्यक हो जाती है वर्ष भर में 3 या 4 निदाई करनी चाहिये निदाई के बाद पोधो की जड़ो में मिट्ठी चढ़ानी चाहिए ताकि पौधे गिरे नही।
रोग और किट नियन्त्रण:-
वेसे तो इस फसल पर कोई विशेष किट और रोगों का प्रभाव नही होता है।लेकिन कही कही तनो के सड़ने और पत्तो पर दब्बो वाली बीमारियाँ का असर देखा गया है।जो एक फफूंद जनक रोग होता है उसके उपचार के लिए मेंन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिडकाव करना चाहिए।
एलोविरा की कटाई और उत्पादन:-
यह फसल एक वर्ष बाद काटने योग्य हो जाती है। कटाई के दौरान पोधो की सबसे पहले निचली ठोस 3 या 4 पत्तो की कटाई करे उसके उपरांत लगभग एक महीने के बाद उस से उपर वाली पत्तियों की कटाई करनी चाहिए कभी भी उपर की नई नाजुक पत्तियों की कटाई नही करे। कटे हुए पत्तों में फिर से नई पत्तिया बननी शुरू हो जाती है।प्रति हेक्टेयर 50 से 60 टन ताजी पत्तिया प्रतिवर्ष मिल जाती है। दूसरे वर्ष में 15 से 20 प्रतिशत वर्धी होती है। बाज़ार में इन पत्तियों की बाजार में अनुमानित कीमत 3 से 6 रूपये किलो होती है। एक स्वस्थ पोधे की पत्तियो का वजन 3 से 5 किलो तक हो जाता है।

कटाई के बाद प्रबंधन और प्रसस्करण:-

एलोविरा का उपयोग
स्वस्थ पत्तियों की कटाई के बाद साफ़ पानी से धो कर पत्तियों के निचले हिस्से में ब्लेड या चाकू से कट लगा कर थोड़े समय के लिए छोड़ देते है। जिसमे से पीले रंग का गाडा चिपचिपा प्रदार्थ-रस (जेल) निकलता है उसे एक पात्र में इक्कठा कर के वाष्पीकरण विधि से इस रस को सुखा लिया जाता है।इस सूखे हुए रस को जातिगत और अलग अलग विधि से तेयार करने के बाद अलग अलग नामों से जाना जाता है। जैसे सकोत्रा,केप,जंजीवर,एलोज,अदनी आदि ।
एलोविरा की खेती करने के क्या फ़ायदा है:-
*इसकी खेती किसी भी जमींन पर आसानी से की जा सकती है।
*कम खर्च और और सस्ती खेती। गरीबी किसान को फ़ायदा।
*सिचाई और दवाई का कम खर्च।
*बंजर और अनूउपयोगी जमीन का उपयोग हो जाता है।
*इसे कोई भी पशु नही खाता है इसे खेत की मेड पर चारों तरफ लगाने से दूसरी फसल की भी सुरक्षा हो जाती है
*एक बार लगाने के बाद 5 सालों तक आसानी से फसल ले सकते है।
*अन्य फसलो की तुलना में मिट्टी का हास कम होता है।
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Thursday, July 14, 2016

my kisan dost

तुलसी की उन्नत खेती केसे करे। kisan tulsi ki kheti kese kre puri jankari hindi me.

Tulsi ki kheti kese kre! Puri jankari hindi me

Tulsi ki kheti ke bare me

तुलसी प्राचीन समय से ही एक पवित्र पोधा  जाता है। जिसे हर घर में लगाकर पूजा आदि होती है।
तुलसी का आयुर्वेद में बहुत बड़ा स्थान है। तुलसी से बहुत सारे रोगों का उपचार किया जाता है। इसका प्रतिदिन सेवन करने से कई प्रकार के रोगों से राहत मिलती है।
वर्तमान में इसे ओषीधिय खेती के रूप में किया जाने लगा है।
यह पुरे भारत में पाया जाता है। इसकी कई प्रकार की जातीया होती है जेसे:- ओसेसिम बेसिलिकम,ग्रेटीसिमम,सेकटम,मिनिमम,अमेरिकेनम।

तुलसी लगाने के लिए खेत की तेयारी केसे करे:-

खेत में प्रथम जुताई से पहले 200 से 300 किवंटल अच्छी पक्की हुई खाद को खेत में बिखर दे ताकि वह मिटटी में अच्छी तरहा से गुलमिल जाये। अंतिम जुताई करते वक्त आप रासयनिक खाद जिसमे यूरिया 100kg और 500kg सुपर फास्फ़ेट और 125 kg म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति हेक्टर के हिसाब से एक समान पुरे खेत में बिखेर दे।
तुलसी के रुपाई के 20 दिनों के बाद खेत में आवश्यक नमी का ध्यान रखकर 50kg यूरिया देवे। दूसरी और तीसरी कटाई के तुरंत बाद भी 50kg यूरिया फसल को देवे यूरिया देते वक्त ध्यान रखे की यूरिया पोधो के पत्तो पर ना गिरे।

तुलसी को खेत में केसे लगाये:-

1 नर्सरी में पोधे तेयार कर के
एक हेक्टेयर के लिए अच्छी किस्म का 300 या 400 ग्राम बीज ले फिर नर्सरी लगाने वाली जमीन की अच्छी जुताई और खाद दे कर उसमे 1 मीटर की 8 से 10 क्यारिया 1 हेक्टर के लिए तेयार कर ले। क्यारी को जमीन से 75सेमी ऊपर उठाना चाहिए और क्यारी से क्यारी की दुरी 30सेमी रखे ताकि खतपतवार को आसानी से निकला जा सके। प्रति क्यारी में 15सेमी की दुरी से बिजो को लगाये लगभग 100 बीज  एक क्यारी में आ जायेगे। बीजो को मिटटी में से ढक देने के बाद उसे पर्याप्त पानी छिडकते रहे 8 से 12 दिनों के बाद बीज अंकुरित हो जाते है। फिर समय समय पर निदाई गुड़ाई और सिचाई करते रहे। जब पोधे 12 से 15सेमी की लम्बाई के हो जाये तो उन्हें सावधानी पूर्वक निकाल के खेतो में रोप सकते है।
2 शाखाओ द्वारा रोपण:-
तुलसी का प्रसारण बीज के अलावा टहनियों से भी किया जाता है। उसके लिए तुलसी की 10 से 15सेमी की टहनी को काटकर उसे छाया में रखकर सुबह साम हजारे से पानी देते रहे भूमि में एक माह के भीतर उसकी जडे विकसित हो जाती है और नई पत्तिया निकलने लगती है। उसके बाद उसे वहा से निकाल कर खेत में रोप सकते है।
पोधे की रोपाई केसे करे:-
जब पोधे नर्सरी में तेयार हो जाये तो उनमे से स्वस्थ पोधो को जुलाई के प्रथम सप्ताह में 45×45सेमी की दुरी पर पोधे रोपे। यदि आप आर.आर.ओ.एल.सी.किस्म की तुलसी लगा रहे हो तो 50×50सेमी की दुरी जरुर रखे।

तुलसी की सिचाई केसे करे:-

पोधे रोपन के बाद हलकी सिचाई की आवश्यकता होती हे।गर्मी के दिनों में 15 दिन के अंतराल में सिचाई करे। पहली फसल कटाई के बाद भी तुरतं बाद सिचाई आवश्यक होती हे। सिचाई से पहले यूरिया उपर लिखे अनुसार देवे। जब भी फसल कटाई हो उसके 10 दिन पहले सिचाई बंद कर देना चाहिए।

खतपतवार नियन्त्रण और खुदाई निदाई:-

तुलसी के खेत में बहुत प्रकार के खतपतवार उग जाते है जो फसल की पैदावार में दिक्कत करते है और पोषक तत्वों के का नाश करते है इसलिए उन्हें रोपाई के 20 दिन बाद खतपतवार को निकाल लेना चाहिए फिर जब भी खतपतवार उगे तो उन्हें नष्ट करना चाहिए। यदि आप एक से अधिक फसल लेना हो तो 10 दिन के अन्तराल में खतपतवार निकालते रहना चाहिए।

फसल की कटाई:-

तुलसी की फसल में कटाई का बहुत महत्व होता है क्यों की कटाई का सीधा असर तेल की मात्रा पर पड़ता है। इसलिए जब पोधो की पत्तियों का रंग पूरा हरा हो जाये तो कटाई कर लेना चाहिए। फुल आने के बाद तेल की मात्रा और गुणवक्ता पर असर पड़ता है। कटाई हमेशा ऊपरी भाग में करना चाहिए ताकि फिर से नए शाखाये और पत्ते आ सके।कटाई हमेशा दराती की मदद से काटना चाहिए।तुलसी की उन्नतशील किस्म जेसे R.R.L.O.P हे जिसकी तिन बार तक कटाई हो सकती है। जिसकी पहली कटाई जून और दूसरी कटाई दिसम्बर और तीसरी नवम्बर में की जाती है। इस किस्म की फसल की कटाई सतह से 30सेमी ऊपर से कटना चाहिए।

तुलसी की आसवन प्रक्रया:-

इस विधि में फसल से तुलसी का तेल निकाला जाता है जिसका प्रयोग बहुत से माउथ वाश सलाद मुररबा आदि में तुलसी का फेलेवेर लाने के लिए उपयोग होता है।आसवन हमेशा ताज़ा फसल से ही किया जाना चाहिए ताकि तेल और गुणवक्ता अधिक मिले।एक हेक्टर तुलसी की फसल से तकरीबन 170kg तक तेल निकल सकता हे।आसवन विधि से तेल निकलने के बाद बची हुई पत्तियों से खाद और बची हुई लकड़ी जलाने के काम आ जाती हे।

तुलसी का उत्पादन :-

तुलसी की खेती करने से प्रथम वर्ष में किसान को 400 किवंटल और उसके बाद वाले वर्षो में लगभग 700 किवंटल शाकीय उत्पादन मिलता है।

सरकार की तरफ से योजना:-

तुलसी की खेती पर कई राज्यों में शासन द्वरा अनुदान भी दिया जाता हे। अनुदान के लिए आप अपने जिले के विरिष्ट उधानिकी विभाग में सम्पर्क कर सकते है।
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* केसे पता करे की आपके पोधो को कोनसी खाद चाहिए।

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