Thursday, March 23, 2017

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Agricultural subsidies ke liye kisan online aavedan kese kare hindi me janakari

नमस्कार माय किसान दोस्तों,
आज हम आपके लिए बहुत ही बढ़िया जानकारी ले कर आयें है। आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे

Agricultural subsidies ke liye kisan online aavedan kese kare

subsidies का मतलब हिंदी में अनुदान होता है। किसानों को खेती करने के लिए आवश्यक संसाधन एवं वस्तुओं  यंत्रो की खरीदी में सरकार की तरफ से दी जाने वाली आर्थिक छूट अनुदान सहायता(subsidies) कहलाती है। कृषि कार्य के लिए ऑनलाइन सब्सिडी आवेदन कैसे करे ये जानने से पहले हम इससे जुड़े  महत्व पूर्ण विषय में चर्चा करेंगे।
1 किसान सरकारी सब्सिडी क्यों ले इसका क्या फ़ायदा होगा।
2 किसान सब्सिडी अनुदान के लिए किस विभाग में आवेदन करे।
3 किसानों को सब्सिडी किन वस्तुओं पर मिल सकती है।
4 online आवेदन करने के लिए किसान को किन document कागज़ात की आवश्यकता होगी।
5 घर बैठे सब्सिडी के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करे।
mkd यानि my kisan dost के पाठक इस पोस्ट को पूरी और लास्ट तक  ध्यान से पढ़े और सरकारी योजना का सही तरीके से लाभ ले पाए।

1 किसान सरकारी सब्सिडी क्यों ले इसका क्या फ़ायदा होगा। 

दोस्तों जैसा की हम सभी किसान जानते है की आज खेती करने में मुनाफ़े की तुलना में लागत कई ज्यादा आती है। आज खेती से जुड़े सभी तरह के यंत्र और संसाधन काफी ज्यादा कीमत के है।  जैसे ट्रैक्टर,सीड ड्रिल ,थ्रेशर,स्प्रिंकलर,ड्रिप आदि कई सारे उपकरण जो की किसान आसानी से नही ख़रीद पाते है।और खरीदते भी है तो कर्ज लेना पड़ता है चाहे बैंक से ले या साहूकार से। दोस्तों आज के समय में हमे खेती को बिज़नेस की तरह करना पड़ेगा वर्ना हम ज्यादा लाभ खेती से नही ले पाएंगे। दोस्तों हर साल देश में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कृषि बजट बनाती है। ताकि किसान अधिक उन्नति और विकास कर सके लेकिन हम जानकारी के अभाव में सब्सिडी सरकारी अनुदान का लाभ नही ले पाते है। और नुकसान उठाते है।सब्सिडी से फ़ायदा- मान लो की हमें सिंचाई के लिए पाइप की आवश्यकता है जो की मार्केट में एक लाख रूपये की लागत के आ रहे है। आप थोड़ी मेहनत कर के जानकारी हासिल कर सब्सिडी में लाये और उन पर आपको 30% छूट सब्सिडी मिल जाये तो आपके 30000 रूपये की बचत होगी। उन पैसों को आप अच्छे बीज खाद् या अन्य जगह लगाकर फ़ायदा ले सकते हो। इसलिए किसान दोस्तों हमें सरकारी सब्सिडी का सही और पूरा लाभ लेना चाहिए।

2 किसान सब्सिडी अनुदान के लिए किस विभाग में आवेदन करे। 

वैसे तो भारत में कृषि से जुड़े हुए कई सारे विभाग है। जो किसानों को अलग अलग तरीके से कई प्रकार की सब्सिडी उपलब्ध करवाते है। आज में आपको ऐसे ही तीन विभागों के बारे में बताएंगे  जिससे आपको अच्छा अनुदान मिल सकता है।
1 कृषि विभाग
2 कृषि अभियांत्रिकी विभाग
3 उद्यानिकी विभाग
इन तीन विभाग के ऑनलाइन आवेदन करने की प्रक्रिया जानेंगे

3 किसानों को सब्सिडी किन वस्तुओं पर मिल सकती है।  

यहाँ में आपको आसानी से समझाने के लिए विभाग के अनुसार बता रहा हु
1 कृषि विभाग मे-
सिंचाई यंत्र जैसे
 स्प्रिंकलर ,ड्रिप,पाइप लाइन,पंप सेट,रेनगन आदि ।
स्वचालित कृषि यंत्र जैसे
 प्रोपेल्ड,रीपर,राउंड बेलर,हार्वेस्टर,फर्टिलाइजर,स्पेंडर न्यूमेटिक प्लांटर  आदि।
ट्रैक्टर चालित यंत्र जैसे
 थ्रेशर,पेड़ी थ्रेशर,कल्टीवेटर,सीडड्रिल,एरोबलास्ट स्पेयर,डिस्क प्लाऊ,लेवेलर डिस्क हैरो,रीपर मूवर,पोटेटो प्लांटर आदि।
2 कृषि अभियांत्रिकी विभाग में-
रेज्ड बेड प्लांटर,मल्टीकाप प्लांटर,हैप्पी सीडर,रीपर कम बाइंडर,मेज थ्रेशर,जीरोटिलेज सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल आदि।
3 उद्यानिकी विभाग में-
औषधीय फसलो पर,प्याज़ भंडार ग्रह, फूलों की खेती के लिए,बाग़वानी फलो के बगीचों के लिए,प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना(M.I.S.)
मसाला फसलो के लिए,मधुमधुमक्खी पालन के लिए,सब्जियों की खेती के लिए और भी कई सारे एवं इन खेती से जुड़े यंत्र जैसे प्लास्टिक मल्च ड्रिप खाद् बीज आदि पर अनुदान उपलब्ध करवाते है
NOTE- ऊपर लिखी वस्तु यंत्र में परिवर्तन होता रहता है। ये राज्य में जिले के कोंटे और बजट के अनुसार पहले आओ पहले पाओ या उपलब्ध संख्या एवं अन्य किसी नियम के अनुसार उपलब्ध होते है।

4 online आवेदन करने के लिए किसान को किन document की आवश्यकता होगी। 

1 लैपटॉप या कम्प्यूटर
2 प्रिंटर स्कैनर
3 पासपोर्ट साइज़ फोटो(केवल JPEG फाइल साइज 50KB से अधिक ना हो)
4 फोटो आइ डी (आधार कार्ड /वोटर कार्ड इन्हें स्क्रीन कर PDF फ़ाइल में 700KB से अधिक साइज ना हो
5 बैंक की पास बुक का पहला पेज ( को स्क्रीन कर ले PDF फाइल 700KB तक IFSC कोड साफ दिखाई दे
6 खसरा दस्तावेज़ (स्क्रीन कर PDF  फाइल साइज 700KB तक
7 जाती प्रमाण पत्र PDF फाइल साइड 700KB तक (केवल अनुसूचित जाती /अनुसूचित जन जाती के लिए
ऊपर दिए गए दस्तावेज़ की सही साइज को सेट कर अपने कंप्यूटर में सेव कर ले नीचे दिए गए तरीके को ध्यान पूर्वक समझे

5 घर बैठे सब्सिडी के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करे।  

सबसे पहले कंप्यूटर में वेब ब्राउज़र खोले उसमे गूगल सर्च इंजन में ये पाँच शब्द सर्च करे -MPFTS -
ये सर्च करने पर आपकी स्क्रीन पर MPFTS की वेबसाइट mpfsts.mp.gov.in/ आ जाएगी आप उसे खोले उसके खुलने पर आपको मध्यप्रदेश फार्मर्स सब्सिडी ट्रेकिंग सिस्टम का  होम  पेज आपको दिखाई देगा पेज में हिंदी में लिखा हुआ दिखेगा नीचे साइड पर आवेदन के लिए यूज़र गाइड है आप उसे डाउनलोड कर के पड़ भी सकते है।
अब आपको वेबसाइट पर पंजीयन के लिए विभाग चुनने है नीचे तीन विभाग बताये गए है आप कृषि विभाग,कृषि अभियांत्रिकी या उधानिकी में से किसी भी विभाग को सेलेक्ट कर सकते हो
में यहाँ आपको डेमो दिखाने के लिए कृषि विभाग को चुना है उसे सेलेक्ट करने पर आपके सामने एक नया पेज खुलेगा उस पर दो ऑप्शन दिखाई देगे
1 नवीन पंजीयन के लिए क्लिक करे
2 पंजीयन स्टेटस की जानकारी प्राप्त करे। यदि आपने पंजीयन करवा रखा हो तो आप पंजीयन संख्या डाल कर अपनी जानकारी देख सकते हो
यदि पंजीयन नही है तो आप पहले वाले ऑप्शन पर क्लिक करे क्लिक करने के बाद आपके सामने एक फार्म खुलेगा उसे आप भरे अच्छे से समझने के लिए आप नीचे फोटो देख सकते है कैसे भरना है।
sarkari subsidi
online aavedan 

फॉर्म में आप अपने हिसाब से भरे जैसे मैने मेरे लिए भरा है।
1 डिविज़न भरे जैसे मैने उज्जैन भरा आप आपका जो भी हो वो भरे
2 अपना ज़िला भरे
3 अपना ब्लाक तहसील भरे
4 आप किस आयटम पर सब्सिडी चाहते हो भरे जैसे सिंचाई या अन्य
5 उसका सब आइटम भरे जैसे ड्रिप पाइप लाइन आदि
6 आपका वर्ग भरे जैसे सामान्य/अनुसूचित जाती आदि जो भी हो
7 अपना लिंग भरे महिला/पुरुष
सही सही जानकारी भरने के बाद अगले पृष्ठ के लिए क्लिक करे
अगले पेज पर आपको एक और फॉर्म भरना है उसमे आपको
1 किसान का नाम
2 पिता या पति का नाम
3 अपने गाँव का नाम भरे
4 फिर अपना पता भरे
5 आपका मोबाईल NO डाले
6 आपकी ईमेल भरे नही हो तो खाली छोड़ दे।
7 अधिकृत जमीन बताये हेक्टेयर में
8 कितनी जमीन पर सिंचाई होती है वो भरे हेक्टेयर में
9 सिंचाई किस से होती है वो लिखें तालाब/कूवा आदि
10 आपका बैंक किस श्रेणी का है उस पर टिक लगाए
11 बैंक का नाम उसकी शाखा जहाँ बैंक हो वो और सही सही बैंक खाता संख्या भरे
पूरा फॉर्म चेक करने के बाद आप अगले पृष्ठ पर क्लिक करे।
subsidi for photo uplod
uplod your document

अब आपके सामने पेज पर दस्तावेज़ अपलोड करना है जो पहले अपनों ने स्क्रीन कर सेव कर रखे है
1 अपना फोटो अपलोड करे
2 अपना आधार कार्ड या वोटर आई डी अपलोड करे
3 बैंक पास बुक को अपलोड करे
4 खसरा दस्तावेज़ अपलोड करे
ये सब बताई गयी साइज में अपलोड कर ले फिर अगले पृष्ठ की और बड़े यदि आपने सही साइज में
अपलोड नही किया तो आप आगे नही भर पाओगे
अगले पृष्ठ पर आपके द्वारा भरी गयी जानकारी और फोटो आदि पूरा विवरण आ जायेगा उसे चेक कर
समिट करे समिट करने के बाद आपको एक पंजीयन संख्या मिलेगी उसे आप संभाल कर कही लिख दे।
और पंजीयन हुआ फॉर्म आपके सामने होगा उसका प्रिंट निकाल ले
agriculture online from
पंजीकृत फार्म 

उस पंजीयन के प्रिंट और अपलोड किये हुए दस्तावेज़ को ले कर आप अपने जिले के सम्बन्धित विभाग में जमा करा दे ताकि जल्दी सत्यापित किया जा सके।
आपके दस्तावेज़ अधिकारियों द्वारा सत्यापित होने के बाद आपके मोबाईल पर SMS आयेगा उसके बाद
आशय पत्र ले कर आप जो भी खरीदना है या जिस पर सब्सिडी दी गयी उनके पक्के बिल और अन्य आवश्यक जो भी विभाग के ज़िला ऑफिस में बताये हो उन्हें वेरिफिकेशन के दौरान अधिकारी को जमा
करा दे पूर्ण जाँच होने के बाद सब्सिडी की रकम आपके द्वारा दिए गए बैंक में जमा हो जाएगी।
ऑनलाइन फॉर्म भरना बहुत ही आसान है क्यों की पूरा ऑनलाइन फार्म हिंदी में है।
यदि आपको फॉर्म में दिक्कत आयें तो आप m.p. online कियोस्क से भी भरवां सकते है वो कुछ नॉर्मल
चार्ज लेगा ।
note दोस्तों ये जानकारी मध्यप्रदेश के किसान के हिसाब से बतायी गयी है अलग अलग राज्यों में अलग
वेबसाइट या प्रक्रिया के जरिये आप सब्सिडी का लाभ ले सकते है बेहतर जानकारी के लिए आप अपने जिले के कृषि विभाग कृषि अभियांत्रिकी विभाग और उधानिकी विभाग के अधिकारी से संपर्क करे ।
दोस्तों आपको यह पोस्ट कैसी लगी हमें नीचे कॉमेंट कर जरूर बताएं हमारी जानकारी आप फेसबुक पर भी ले सकते है उसके लिए हमारा फेसबुक पेज और ग्रुप join  करे।
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                         ➦जय जवान ➥जय किसान ➥जय विज्ञान 

क्या आपको ये जानकारी पता है नही तो क्लिक कर पोस्ट पढ़े । 

➤ मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना के बारे में 
➤ सरकार की कृषि विपणन  योजना की जानकरी 
➤ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना  
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Wednesday, March 1, 2017

Unknown

6 best Medicinal plants की खेती करने से किसानों को होगा ज्यादा benefit

दोस्तों आज की दुनिया में सभी अच्छा और ज्यादा पैसा कमाना चाहते है। चाहे वो व्यापारी हो या एक आम  आदमी। किसान भी अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन पोषण करने के लिए दिन रात कड़ी मेहनत करता है। ताकि ज्यादा पैसा और benefit ले सके। लेकिन यदि वह Traditional और पुराने तरीके से खेती करेगा तो आज के युग में पिछड़ जायेगा। इसलिए उसे हर उस नये तरीके और खेती को अपनाना पड़ेगा जिससे उसकी आय बढ़ सके। कम खर्च में अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए भारत में कुछ वर्षो में औषधीय फसलो Medicinal farming की तरफ किसानों का रुख बढ़ा है। और इस तरह की खेती कर कई सारे किसान माला माल भी हुए है। और इन औषधीय पोधों की खेती कारण बेकार पड़ी बंजर और पहाड़ी इलाकों में भी खेती करना सम्भव हो पाया है।
आज हम कुछ ऐसी 6 बेस्ट औषधीय फसलो 6 best Medicinal plants के बारे में संक्षिप्त में जानकारी देंगे जिसमे stevia,aarimishiya,lemon grass,shatavari,tulsi,alovera की खेती मार्केटिंग  और ट्रेनिंग के बारे में जानेंगे।  इसलिए लास्ट तक पूरी पोस्ट पढ़े। 

 6 बेस्ट औषधीय फसलो की खेती के बारे में जानकारी 

best medicinil plant farming
medicinal plant farming

1 stevia ki kheti 

स्टीविया एक लोकप्रिय और लाभदायक औषधीय पौधा है। यह पौधा अपनी पत्तियों की मिठास के कारण जाना जाता है। इतना मिटा होने के बाद भी इसमें शर्करा  की मात्रा नही होती है। यह एक शून्य कैलोरी उत्पाद है। यह मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिका में अधिक पाया जाता है। यह मधुमेह वाले रोगियों के लिए काफी लाभदायक माना जाता है। यह रोगी के शरीर में इंसुलिन बनाने में मदद करता है। इसकी बढ़ती माँग को देखकर विश्व के कई देशों जैसे जापान,अमेरिका,ताइवान,कोरिया,आदि में इसकी व्यावसायिक तौर पर इसकी खेती की जा रही है। भारत में भी मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,गुजरात,झारखंड आदि कई सारे राज्यों में इसकी खेती की शुरुआत हो चुकी है। स्टीविया की खेती के लिए अर्द्ध आर्द्र और अर्द्ध उष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। india में इसकी खेती पूरे साल में कभी भी कर सकते है। बस जिस क्षेत्र का तापमान शून्य डिग्री से नीचे जाता हो वहाँ इसकी खेती नही करना चाहिए। 
इसकी अच्छी पैदावार के लिए दोमट जमीन जो 6ph से 7ph के अंदर होनी चाहिए एवं उचित जल निकास वाली होना चाहिए। यह फसल सूखा सहन नही कर सकती इसलिए इसकी सिंचाई 10 दिनों के अंतराल में करना चाहिए। साल भर में इसकी 3 से 4 कटाई होती है उस कटाई में 60 से 90 क्विंटल तक सूखे पत्ते प्राप्त किये जा सकते है। यदि हम इनके अन्तर्राष्ट्रीय भाव की बात करे तो 300 से 400 रूपये प्रति किलो ग्राम है। लेकिन भारत में उचित market नही होने पर हम इसका अनुमानित भाव 80 रूपये किलो मान ले तो 60 क्विंटल उत्पादन होने पर 4 से 5 लाख़ रूपये तक की आय प्रति एकड़ हो जाती है। इसकी खेती contacts farming बेस पर ही करना चाहिए ताकि फसल बेचने संबंधित कोई दिक्कत नही आए। 

2 Artimishia ki kheti 

आर्टीमीशिया एक बहुत गुणकारी औषधीय पौधा है। इसका उपयोग मलेरिया की दवाई इंजेक्शन और teblets बनाने में होता है। इसकी खेती चाइना,तंज़ानिया,केन्या आदि देशों में बड़े पैमाने पर की जा रही है। इसकी बढ़ती मांग को देखकर भारत में सीमैप (cimap) ने वर्ष 2005 से इसकी खेती करवाना और ट्रेनिंग देने की शुरूआत की है। इसकी खेती करने के लिए नम्बर दिसम्बर में नर्सरी तैयार करना पड़ती है। और फ़रवरी के माह में इसको खेत में लगाना पड़ता है। इस फसल को बहुत काम खाद् पानी की जरूरत पढ़ती है। इससे को वर्ष में 3 बार  उपज प्राप्त कर सकते है। प्रति बीघे में ढाई से साढे तीन क्विंटल पत्तियां निकलती है। इन पत्तियों को कंपनी 30 से 35 रूपये किलो तक खरीदते है। जिससे किसान को प्रति बीघा 9000 से 10000 तक का फ़ायदा होता है। और अगर हम इसकी लागत को देखे तो मात्र 15 से 20 हजार प्रति एकड़ के हिसाब से आती है। इसके बीज contacts farming कंपनी मुफ्त में उपलब्ध करवाती है। बीज के लिए किसान सीमैप लखनऊ या इफका लेब मध्यप्रदेश से सम्पर्क करे।

3 lemongrass ki kheti 

गर्म जलवायु वाले देश सिंगापुर,इंडोनेशिया,अर्जेंटीना,चाइना,ताइवान,भारत,श्रीलंका में उगाया जाने वाला हर्बल पौधा है। इसकी पत्तियों का उपयोग लेमन ट्री बनाने में होता है। इससे निकलने वाले तेल का उपयोग कई तरीके के सौदर्य प्रसाधन एवं खाद्य में निम्बू की खुशबू (फ्लेवर) लाने के  लिए होता है। भारत में सीमैप CIMAP के जरिए इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसान को पौधे देने के साथ साथ प्रशिक्षण और तेल निकालने से ले कर मार्केटिंग तक की जानकारी उपलब्ध करवाता है। इसकी खेती करने के लिए पहाड़ी क्षेत्र उपयुक्त रहता है। जैसे की राजस्थान के बांसवाड़ा,डूंगरपुर,प्रतापगढ़ आदि 
लैमन ग्रास का पौधा साल भर में तीन बार उपज देता है। हर कटाई करने के बाद इसकी सिंचाई करने से उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। lemon grass की खेती करने के लिए सर्व प्रथम अप्रैल मई माह में इसकी नर्सरी तैयार की जाती है। प्रति हेक्टेयर 10 किलो बीज काफी होता है। जुलाई अगस्त में पौधे खेत में लगाने के लायक हो जाते है। इसके पोधों को क्यारी में 45 से 60 सेमी की दूरी पर लगाए जाते है। प्रति एकड़ में लगभग 2000 पौधे लगाए जा सकते है। इस फसल को बहुत ही काम सिंचाई की जरूरत होती है। काम वर्षा होने पर इसकी सिंचाई आवश्यकता अनुसार कर सकते है। लेमन ग्रास की पहली कटाई 120 दिनों के बाद शुरू हो जाती है। उसके बाद दूसरी और तीसरी कटाई 50 से 70 दिनों के अंतराल में होती है। लेमन ग्रास के छोटे छोटे टुकड़े कर आसवन विधि से तेल निकाला जाता है। प्रति एकड़ में लगभग 100 किलो ग्राम तेल का उत्पादन होता है। जिसकी बाजार में कीमत 700 रूपये किलो से लेकर 900 रूपये किलो ग्राम तक होती है। 

4 satavar ki kheti 


शतावरी को कई नामो से जाना जाता है जैसे शतावरी सतसुता लेकिन इसका वैज्ञानिक नाम एस्येरेगस रेसीमोसा है। इस औषधि का उपयोग शक्ति बढ़ाने,दूध बढ़ाने ,दर्द निवारण एवं पथरी संबंधित रोगों  के इलाज़ के लिए किया जाता है। सतावर की खेती करने के लिए 10 से 50 डिग्री सेल्सियस उत्तम माना जाता है। इसके लिए खेत को जुलाई अगस्त माह में 2-3 बार अच्छी जुताई कर लेना चाहिए। अंतिम जुताई (अगस्त) के समय 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद् प्रति एकड़ मिला लेना चाहिए। फिर 10 मीटर की क्यारी बना कर बीजो की बुआई करना चाहिए। बुआई ले लिए प्रति एकड़ 5 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बाजार में सतावर के बीज का मूल्य 1000 किलो ग्राम तक रहता है। बीज को बोने एक सप्ताह बाद हलकी सिंचाई करे। दूसरी सिंचाई जब पौधे बड़े हो जाये उसके बाद करना चाहिए। सतावर को बहुत ही काम सिंचाई की जरूरत होती है। जब पौधे के पत्ते पिले पड़ जाये तो इसकी खुदाई कर के रसदार जड़ों को निकाल ले। गीली जड़ों का उत्पादन प्रति एकड़ 300 से 350 क्विंटल तक होता है। खेत से निकली जड़ों को अच्छे से सफाई कर के तेज़ धूप में रखना होती है। जब जड़े सुख जाती है तो उनका वजन घटकर 40 से 50 क्विंटल तक रह जाता है। बाजार में इन जड़ों की कीमत 250 से 300 प्रति किलो तक रहता है। सतावर की बिक्री दिल्ली,लखनऊ,कानपुर,बनारस में बड़े पैमाने पर होती है। सतावर के बीज उद्यानिकी विभाग,सीमैप और निजी दुकानों पर आसानी से मिल है। 

5 tulsi ki kheti 

तुलसी  का पौधा प्राचीन समय से ही हर घर के लगया जाता रहा है। तुलसी का पौधा जितना पूजनीय है उससे कई ज्यादा उसमे औषधीय गुण होते है। तुलसी की खेती अब व्यावसायिक रूप में होने लगी है। तुलसी के पत्ते तेल और बीज को बेचा जाता है। तुलसी काम पानी और काम लागत में ज्यादा फ़ायदा देने वाली औषधीय फसल है। भारत में कई सारी राज्य सरकारें तुलसी की खेती करने पर अनुदान भी उपलब्ध करवा रही है। तुलसी के बीज निजी दुकानों और आपके जिले के उधानिकी विभाग में भी आसानी से उपलब्ध हो जाते है। तुलसी के बीज बेचने के लिए मध्यप्रदेश की नीमच मंडी बेस्ट है। नीमच मंडी में सैंकड़ो प्रकार की औषधियों की खरीदी होती है। 
online mandi bhaw देखने के लिए आप लिंक को खोले ⇐ open 
तुलसी की खेती कैसे करे कब सिंचाई करे कौनसा खाद् दे पूरी जानकारी पढ़ने के लिए आप इस लिंक को खोले किसान तुलसी की खेती कैसे करे पूरी जानकारी पढ़े। 

6 alovera एलोवेरा ki kheti 

दोस्तों एलोवेरा कई सारे नामो से जाना जाता है। जैसे घृतकुमारी,ग्वारपाठा,एलॉय आदि। 
एलोवेरा एक औषधीय फसल है। जिसकी खेती भारत के कई सारे राज्यों में हो रही है। एलोवेरा के बारे में हमने बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है जिसमे एलोवेरा की खेती कैसे करे कब सिंचाई करे कब और कैसे उत्पादन ले यदि आपने वो पोस्ट नही पढ़ी तो पहले उसे नीचे दी गयी लिंक को खोल कर जरूर पड़े 
⇨ एलोवेरा की खेती कैसे करे पूरी जानकारी हिंदी में open now ⇦
इस पोस्ट को लिखने के बाद मुझे my kisan dost पर कई सारे सवाल मुझसे कॉमेंट में ईमेल के जरिए और फेसबुक पर पूछे गए में उन सवालों को आपके बीच में शेयर करना चाहुगा ताकि आपको भी benefit मिल सके।  ज्यादा संख्या में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न 
1 एलोवेरा की फसल कितना मुनाफ़ा,लाभ,कमाई होती है ?
ans-
दोस्तों यदि हम एक बीघे के हिसाब की बात करे तो (contect farming के अनुसार)
एक बीघे खेत में क्यारियों में 2 ⅹ 2 फिट की दूरी पर 6000 से 7000 पौधे लगाए जाते है। प्रति पौधा लागत 4 रूपये माने तो 7000ⅹ 4 रूपये =28000 रूपये ख़र्चा (अनु.) 
एलोवेरा का पौधा लगाने के बाद 9-10 माह बाद फसल देने के लायक होता है।  हर्बल कंपनियाँ 3 से 4 रूपये किलो पत्तियां खरीदती है। प्रति पौधे से हमें 3 से 7 किलो तक पत्तियां मिल जाती है। यदि हम एक बीघे में 7000 हजार पोधों से प्रति पौधा मात्र 3 किलो उत्पादन माने तो 7000 ⅹ 3 किलो =21000 किलो ग्राम । 
प्रति किलो 3 रूपये माने तो 21000 ⅹ 3 रूपये =63000 हजार रूपये अब खर्च को घटाए तो 63000-28000 =35000 रूपये शुद्ध मुनाफ़ा प्रति बीघे में उसके बाद भी 3 से 4 बार कटाई साल में होती है। और एलोवेरा को एक बार लगाने के बाद 4-5 सालों तक उत्पादन होता है। 
दूसरा सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल ये की 
2 aloevera ki fasl kaha beche,ग्वारपाठा की मंडी कहा है। एलोवेरा की फसल कौन  खरीदेगा  aloevera market etc.
ans-
 दोस्तों ये सवाल बहुत ही लाज़मी भी है। अगर हम किसी भी फसल की मार्केटिंग के बारे में बिना सोचे उस फसल को लगाएंगे तो नुकसान होना तो निश्चित है। और बहुत से किसानों को नुकसान भी हुआ है। अब जब भी कोई नई फसल आप लगाए तो पहले उसे बेचने के लिए मार्केट जरूर conform कर ले। अब मुद्दे की बात पर आते है भारत में एलोवेरा की seling कहाँ करे तो भारत में सबसे ज्यादा एलोवेरा की खपत करने वाली कंपनियाँ-पतंजलि ,हिमालया,डाबर और भी कई सारी हर्बल कंपनियां है जो की कॉन्टेक्ट फार्मिंग पर पौधे देती है और खरीदती है। आप जिस भी कंपनी से या नर्सरी से पौधे ख़रीदे उसी के साथ बेचने का अनुबंध भी कर ले। किसी भी किसान दोस्त को ऐसी हर्बल कंपनियों के contect no या पते की जरूरत हो तो मुझे आप कॉमेंट या ईमेल अथवा facebook page पर sms कर दे में आपको दे दूँगा। 
इसके अलावा कोई हर्बल कंपनी चाहे तो वो अपना contect no भी पोस्ट कर दे ताकि किसानों को आपसे सम्पर्क करने में आसानी हो (webside की लिंक पोस्ट ना करे सिर्फ text में लिखे link वाले comment publish नही होंगे)
एक और सवाल जो बहुत से किसान भाई पूछते है 
Medicinal plants training kaha se le,औषधीय फसलो की खेती का ट्रेनिंग कहा से ले ?
ans-
इसके जबाब में आप लोगो को बताना चाहूंगा की भारत में औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान सीमैप के जरिये इन औषधीय फसलो पर रिसर्च के साथ साथ किसानों को समय समय पर मार्गदर्शन भी देती है।  यह एक सरकारी संस्था है यह संस्था जानकारी देने के लिए कई मेले,सेमिनार का आयोजन करती है जिसमे किसान सीधे विज्ञानिकों से बातचीत कर सके साथ ही कई सारी लेख सामग्री भी प्रकाशित करती है। यह संस्था पौधे देने के साथ उसकी मार्केटिंग आदि के बारे में भी जानकारी उपलब्ध करवातीं है।  सीमैप का पता - Central Institute of Medicinal and Aromatic Plants
निर्देशक केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान cimap कुकरैल,लखनऊ-उत्तरप्रदेश फोन no 0522-2359623 
CIMAP के चार रिसर्च सेंटर-बैंगलोर,हैदराबाद,पंतनगर,पुरार में है। 
इसके अलावा आप अपने जिले के कृषि विभाग,कृषि विज्ञान केंद्र और उधानिकी विभाग के अधिकारियों और कृषि विज्ञानिकों के सम्पर्क में रहो और जब भी किसी कृषि मेले सेमिनार का आयोजन हो तो उसमे हिस्सा लो इंटर नेट पर कृषि रिलेटेड आर्टिकल पढ़ो एवं  कृषि लेख,पत्र,पत्रिका आदि को पढ़े। 
मैने इस पोस्ट माध्यम से आपको औषधीय Medicinal and Aromatic Plants खेती करने के benefit और marketing के साथ training के बारे में बताया है। यदि इस पोस्ट से जुड़ा आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो हमें comments के जरिए जरूर बताये आप से बात कर के मुझे अच्छा लगता है। 
इस जानकारी को अपने दोस्तों में शेयर करने के लिए नीचे दिए गए सोशल बटन का प्रयोग करे 
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Sunday, February 5, 2017

Unknown

Quiona ki kheti kese kare क्विनवा की खेती की पूरी जानकरी

नमस्कार दोस्तों अभी कुछ समय से मैने कई सारे किसानों के खेतो में किनोवा की फसल लगी हुई देखी तो मैने सोचा क्यों ना इसकी जानकरी my kisan dost से जुड़े सभी पाठकों को दी जाये तो  वैसे तो क्विनवा की खेती करने के लिए किसी विशेष तकनीक की आवश्यकता नही होती है फिर भी नई फसल और खेती के बारे जानना ज़रुरी होता है !

किनोवा (Quiona) की खेती केसे करे 

Qvino ki kheti kese kre
अजित सिंह क्विनवा की फसल के साथ 

सामान्य परिचय → 

क्विनवा बथुआ प्रजाति का सदस्य है जिसका वनस्पति नाम चिनोपोडियम क्विनवा है ग्रामीण एरिया में शब्द उच्चारण के कारण इसे किनोवा, केनवा आदि कई नाम से बताया जाता है! इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण  अमेरिकी देशों में की जाती है! जिसमे इंग्लैंड,कनाडा,आस्टेलिया,चाइना ,बोलिविया ,पेरू इवाडोर आदि 
क्विनवा की खेती इस फसल को रबी के मौसम में उगाया जाता है ! इसका उपयोग गेहू चावल सूजी की तरह खाने में किया जाता है!

जलवायु और मिट्टी का प्रकार →

इसकी खेती करने के लिए कोई विशेष जलवायु और मिट्टी की आवश्यकता नही होती है यह पहाड़ी इलाकों से लेकर मैदानी और  बंजर भूमि में भी लगाया जा सकता है भारत की जलवायु इसके लिए अनुकूल है इसके बीज अंकुरण के लिए 18 से 24 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है! अच्छी पैदावार के लिए रात में ठण्ड और दिन में 35 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है!

खेत की तैयारी →

खेत की तैयारी के लिए खेत को अच्छी तरह से 2 और 3 बार जताई कर के मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए अंतिम जताई से पहले खेत में 5,6,टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद् मिला देना चाहिए फिर उचित जल निकास की व्यवस्था करनी चाहिए !

क्विनवा की बुआई →

आप इसकी बुआई ओक्टुम्बर , फरवरी,मार्च  और कई जगह जून जुलाई में भी कर सकते है  इसका बीज बहुत ही बारीक़ होता है इसलिए प्रति बीघे में 400 से 600 ग्राम पर्याप्त होता है  इसकी बुआई कतरों में और सीधे बिखेर कर भी कर सकते है! इसका बीज खेत की मिट्टी में 1.5 सेमी से 2 सेमी तक गहरा लगाना चाहिए  जब इसके पौधे 5,6 इंच के हो जाये तब पौधे से पौधे के बीच  की दूरी 10 से 14 इंच बना लेनी चाहिए exrta पौधे को हटा देना चाहिए !

सिचाई और खरपतवार →

बुआई के तुरंत बाद सिचाई कर देना चाहिए इसके पौधे को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है फसल लगाने से काटने तक 3 से 4 बार पानी देना पर्याप्त रहता है! जब पौधे छोटे रहे तब खतपतवार को निकलवा देना चाहिए 

किट और रोग प्रबंधन →

क्विनवा के पौधे में किटो और रोगों से लड़ने की बहुत ज्यादा capesity रहती है साथ ही पाले और सूखे को भी सहन कर सकते है ! अभी तक इस पर किसी भी प्रकार के रोगों की जानकरी नही मिली है!

फसल की कटाई →

क्विनवा  की फसल 100 दिनों में तैयार हो जाती है अच्छी विकसित फसल की ऊचाई 4 से 6 फिट तक होती है इसको सरसों की तरह काट कर थ्रेसर मशीन में आसानी से निकाल सकते है बीज को निकालने के बाद कुछ दिनों की धुप  आवश्यक होती है ! प्रति बीघा उत्पादन 5 से 8-9 क्विंटल तक होता है!

क्विनवा के बारे में और अधिक जानकारी →

1 इंटर नेशनल  बाज़ार में इसका भाव 500 से 1000 रूपये किलो तक है 
2 100 क्विनवा में 14 ग्राम प्रोटीन ,7 ग्राम डायटरी फाइबर 197 मिली ग्राम मैग्नेशियम 563 मिली ग्राम पोटेशियम 0.5 मिली ग्राम विटामिन B पाया जाता है।
3  इसका प्रतिदिन सेवन करने पर हार्ट अटेक,केंसर,और सास सम्बन्धित बीमारियों में लाभ मिलता है।
4 कम पानी और कम खर्च में अच्छा लाभ देने वाली फसल है।
5 इसके पत्तों की भांजी बना कर भी खाया जा सकती है।
6 यह खून की कमी को दूर करता है
⇛ इसके बीज आसानी से किसानों के पास उपलब्ध है ! इसे नीमच म.प्र. की मंडी में भी बेचा जा सकता है। और यदि किसी किसान भाई के पास अच्छे भाव मिलने वाली मंडी या contact farming करने वाली कम्पनी के no हो तो कमेंट में ज़रुर लिखे ताकि सभी किसान भाइयों को इसका लाभ मिल सके।
**Abhi marke ret kam hai kisan bhai lagan se pahle local ret confirm kr le **
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स्ट्राबेरी की खेती कैसे करे 
⇒एलोविरा की खेती की जानकारी 
⇒ड्रेगन फ्रूट की खेती कैसे करे 
⇒पशुओ में अफरा होने पर क्या करे 
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Wednesday, January 18, 2017

Unknown

ड्रेगन फ्रूट की खेती केसे करे cultivation of dragon fruit

aadhunik kheti kese kre
ड्रैगन फ्रूट की खेती 

हेल्लो दोस्तों नमस्कार आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे ड्रैगन फ्रूट की खेती कैसे करे जैसा की दोस्तों आप सभी जानते हो की यदि किसान पारंपरिक फसले और पुराने तरीके से खेती करेगा तो आज के युग में पिछड़ जायेगा इसलिए आज किसान को हाई टेक तरीके और नई फसलो पर ध्यान देना होगा मेरा भी हमेशा से इस साइड www.mykisandost.com के माध्यम से प्रयास रहता है की में अपने पाठको को लेटेस्ट जानकारी प्रदान करता रहू!

   
                                   

ड्रैगन  फ्रूट की खेती कैसे  करे cultivation of dragon fruit

ड्रैगन फ्रूट के बारे में जानकारी (परिचय )⟹

यह फल मुख्य रूप से थाईलैंड,ijrail ,मलेशिया श्री का और वियतनाम में लोकप्रिय है!वहा पर इसकी व्यावसायिक खेती होती है लेकिन अब इसकी खेती भारत में भी कई जगह होने लगी है! जिसकी मुख्य वजह इसकी अच्छी  कीमत का मिलना और कम वर्षा वाले स्थान पर अच्छी पैदावार का होना है!
ड्रैगन फ्रूट के पोधो को बहुत सारे लोग अपने घर में fesion की  तरह गमले में भी लगाते है!इसके फ्रूट से आइसक्रीम jeli  jem ,juse ,के साथ साथ bhuty क्रीम के तोर पर फ़ेस पैक का इस्तेमाल किया जाता है!
ड्रैगन फ्रूट स्वस्थ के लिए भी काफी लाभदायक माना जाता है इस फल में एंटी ऑक्सीडेंट की मात्रा कई ज्यादा पायी जाती है जो कई सारे रोगों से लड़ने में सहायता करता है इस फल के सेवन से मधुमेह नियंत्रित होती है शरीर में बड़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करता है hart  releted  बीमारियों में भी काफी लाभदायक रहता है 

ड्रैगन की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु ⟹

इसके पोधो में मौसमी परिवर्तन यानि तापमान का उतार चढ़ाव को आसानी से सहन कर सकते है 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त रहता है इसके पोधो को ज्यादा धुप वाली उँची जगह पर नही लगाना चाहिए! इसकी  खेती 50% वार्षिक औसत बरसात होने वाली जगह पर आसानी से की जा सकती है!

मिट्टी के प्रकार ⟹

वैसे तो इसकी खेती के लिए कोई विशेष प्रकार की मिट्टी की आवश्यकता नही होती है आप सभी तरह की कम उपजाऊ मिट्टी में भी इसे लगा सकते है लेकिन व्यावसायिक रूप से आप खेती करना चाहते है तो 5.4 ph मान से 7ph मान वाली मिट्टी में इसे लगाये!

केसे करे खेत की तैयारी ⟹

खेत की तैयारी के लिए पहले खेत को 2 या 3 बार गहरी जूताई कर ले ताकि उसमे सभी प्रकार के खरपतवार नष्ट हो जाये उसके बाद खेत में गोबर वाली खाद् या  वर्मी कम्पोस खाद् खेत की मिट्टी में मिलाये एवं उचित जल निकास  की व्यवस्था रखे 

इसके पौधे केसे तैयार करे ⟹

इसके पौधे तैयार करने के लिए दो तरीके है एक बीज के द्वारा  और दूसरा अन्य पौधे की शाखा(कलम ) द्वारा बीज से पौधे तैयार करने में काफी ज्यादा समय लगता है इसलिए अधिकतर किसान शाखा(कलम ) विधि का ही उपयोग करते है जो की व्यावसायिक खेती के लिए उत्तम होता है!शाखा के जरिये पौधे तैयार करने में स्वस्थ पौधे की छंटाई कर उसकी शाखाओं(कलम ) को 20 सेमी लम्बे टुकड़े का उपयोग करना चाहिए अलग की गयी शाखाओं को रोपने से पहले छाँव में ही रखनी चाहिए !
dregan ke podhe khet me
ड्रैगन फ्रूट प्लांट 

पौधे  लगाने का तरीका ⟹

इसके कमल पोधों को लगाने के लिए एक कतार में 2 मीटर की दूरी छोड़ कर 60 सेमी चोडा और 60 सेमी गहरा गड्डा खोदा जाना चाहिए फिर कलम वाले पोधों को सूखे गोबर और बालू रेत  को 1:1 :2 के अनुपात में मिला कर गड्डे में रोपे गड्डो में मिट्टी के साथ प्रति गड्डे में 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और कम्पोस्ट मिला कर भर दे! इस तरह एक एकड़ ज़मीन में 1700 पौधे लग जायेंगे ड्रैगन फ्रूट के पौधे काफी तेजी के साथ विकसित होते है उन्हें सहारा देने के लिए सीमेंट का पोल और तख्त लगाना चाहिए!

ड्रेगन फ्रूट की सिचाई ⟹

अन्य फसल की तुलना में ड्रैगन फ्रूट को काफी कम पानी की आवश्यकता होती है रो पाई के तुरंत बाद पानी दे फिर एक सप्ताह उपरांत सिचाई करे गर्मी के दिनों में आवश्यकता अनुसार सिंचाई करे ड्रैगन की सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई बेस्ट रहती है!

खाद् और उर्वरक ⟹

इसके पोधों के विकास में जीवाश्म तत्व मुख्य रूप से सहायक होते है!इसलिए प्रति पौधे 10 से 15 किलो तक को जैविक उर्वरक कम्पोस्ट देना चाहिए!जैविक खाद् की मात्रा प्रति दो वर्ष में बढ़ाते रहना चाहिए  पौधे के समुचित विकास के लिए समय समय पर रासायनिक खाद्  भी देना चाहिये जिसमे पोटाश + सुपर फास्फेट +यूरिया  को  40:90:70 ग्राम प्रति पौधा देना चाहिए ! जब पोधों में फल लगना शुरू हो जाये तब नाइट्रोजन की मात्रा कम कर के पोटाश की मात्रा बड़ा देनी चाहिए जिससे अधिक उपज प्राप्त हो सके फूल आने से पहले और फल आने के समय प्रति पौधे में 50 ग्राम यूरिया 50 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 100 ग्राम पोटाश देना चाहिए प्रति वर्ष प्रति पोधे में 220 ग्राम रासायनिक खाद् की मात्रा बड़ाई जानी चाहिए अधिकतम मात्रा 1.5 किलो तक हो सकती है 

ड्रैगन फ्रूट के बारे में और अधिक ⟹

इस के पोधों में अभी तक किसी भी तरह के किट और बीमारी नही आयी है!
इसके पौधे एक साल में ही फल देने के लायक हो जाते है  मई जून महीने में फूल लगते है और अगस्त से दिसम्बर तक फल आ जाते है!
प्रति एकड़ 5 से 6 टन उत्पादन होता है 
इसका बाजार में भाव प्रति किलो 200 से 250 तक रहता है!
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग 

लाभ और उपज का गणित ⟹

ड्रैगन फ्रूट  एक सीज़न में 3 से 4 बार फल देता है प्रति फल का वजन लगभग 300 से 800 ग्राम तक होता है एक पोल पर 40 से 100 फल तक लगते है जिनका अनुमानित वजन 15 से 25 किलो प्रति पोल एक एकड़ में अनुमानित 300 पोल  प्रति पोल पर फलो का कम से कम वजन 15 किलो मान लेते है तो  वजन 4500 और बाजार भाव कम से कम 125 रूपये प्रति किलो माने तो भी प्रति एकड़ अनुमानित 5,62,500 की आमदनी होती है

ड्रैगन फ्रूट के पौधे कहा से ख़रीदे ⇒

दोस्तों अब ये ड्रैगन फ्रूट की खेती में अच्छा मुनाफ़ा है तो इसके पौधे कहा से ख़रीदे और इसकी खेती कहा पर देखे तो उसके लिए आपको किसी अच्छी नर्सरी से सम्पर्क करना पड़ेगा उसके लिए आप मुकेश धाकड़ की नर्सरी श्री मारुती नर्सरी में सम्पर्क कर सकते है! उनके मोबाइल no 09981961396 है मुकेश जी के बारे में अधिक जानने के लिए आप ये पोस्ट भी पढ़ सकते है intro with mukesh dhakad rajod
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Saturday, January 14, 2017

Unknown

pashu me lagne wale rogo ki janakri part 2 पशु रोगों की पहचान भाग 2

नमस्कार दोस्तों पिछली पोस्ट पशुओं में होने वाले रोगों की पहचान कैसे करे भाग 1 में हमने 14 प्रकार के रोगों के बारे में जाना था यदि आपने वो पोस्ट नही पढ़ पाए तो यहाँ क्लिक कर के पढ़ ले
pashu rog pahchan part 2
पशु रोग के बारे में 
आज की इस पोस्ट में हम बाकी पशु रोगों के बारे में जानेंगेदोस्तों पशुओं में कई सारे रोग होते है यहाँ में कोशिश करुँगा की ज्यादा ज्यादा रोगों के बारे में बताऊ फिर भी बहुत सारे रोग छूट जायेंगे जो छूट जायेंगे उनके बारे में next time बताएँगे तो चलिए सीधे मुद्दे की बात करते है 

pashu me lagne wale rogo ke bare me janakri part 2

1 सर्रा रोग ⇒

दोस्तों यह रोग ट्रिपैनोसोमा -एवेनसाई  नामक परजीवी कीटाणु के कारण फैलता है। यह बीमारी मेरुदंड वाले पशु जैसे घोड़े,गधे ,ऊँट एवं खच्चरों में अधिक लगता है। यह रोग वर्षा ऋतु के बाद अधिक फैलता है जो की मक्खियों द्वारा इसे फैलाया जाता है इस रोग से पशु में बुखार आता है पशु के खून में कमी आ जाती है पशु सुस्त रहता है उसका वजन कम हो जाता है कोई कोई पशु चक्कर भी काटने लगते है पशु की नज़र कमजोर हो जाती है। पशु दाँत पीसने लगता है बार बार मल मूत्र त्याग करता है गाय भैंसों  में इस रोग का आसानी से पता नही चल पाता है क्यों की बाहरी लक्षण इतने स्पष्ट रूप से नही दीखते है

2 पशु  मुहँ के छाले एवं घाव ⇒

 पशु के पेट में ख़राबी होने से उनके मुहँ में घाव और छाले हो जाते है। जिससे पशु के खाने पीने में दिक्कत होती है वो दिन प्रतिदिन दुबला होता जाता है !यह रोग बढ़ने पर मुहँ के छाले पेट और आंतों में फेल जाते है और पशु की मृत्यु हो जाती है इसके लक्षण कभी कभी पशु को ज्वर आ जाता है मुहँ से जाग निकलते है जीभ सूज जाती है पशु की जीभ तालू होठ आदि लाल हो जाते है पशु खाना पीना छोड़ देता है 

3 अफ़रा रोग ⇨

यह रोग पशु के अधिक खाने से होता है जिसमे पशु का पेट फूल जाता है इस रोग के बारे में मैने पूरी जानकारी विस्तार से लिखी है जिसमे रोग के लक्षण और बचाव के साथ साथ घरेलू उपचार एवं दवाइयों के बारे में लिखा है आप इस लिंक को खोल कर जानकारी पढ़े ⇒⇒⇒ पशु में अफरा रोग होने पर क्या करे 

4 पशु में दस्त ⇨

पशु में दस्त लगने का मुख्य कारण अपच यानि पाचन क्रिया ढंग से नही होने से होती है क्यों की कई बार पशु सडा गला दूषित भोजन और गन्दा पानी पी लेता है और जुगाली करने के लिए पर्याप्त समय नही मिल पाने से और चारा खाते ही तुरंत काम पर लग जाने से ये रोग हो जाता है इस रोग के कारण पशु पतला पतला गोबर करने लगता है बिना पची हुई वस्तु गोबर में निकालने लगता है उसकी भूख कम हो जाती और प्यास बढ़ जाती है उसकी त्वचा सूख ने लगती है ये सब लक्षण पशु में दिखने लगते है

5 कण्ठ अवरोध ⇒

जब पशु कोई ऐसी कड़ी वस्तु जैसे गाजर मूली गुठली या कोई फल को बिना चबाये निगल जाता है तो वह भोजन की नली यानि गले में जा कर अटक जाता है पशु बार बार उसे निगलने की कोशिस करता है बार बार खासता है मुँह से लार निकलता है ऐसी अवस्था में पशु काफी ज्यादा बेचैन हो जाता है यदि उसके गले में वो वस्तु ज्यादा देर तक रहती है तो पशु को अफ़रा हो जाता है और पशु मर जाता है इसका एक ही उपाय है तत्काल अटकी हुई वस्तु को किसी भी उपाय से निकलवा दे या फिर पशु सर्जन से आपरेशन करवाये 

6 पशु जुगाली न करना ⇒

पशु को चारा खिला कर सीधे काम पर लगा देना ख़राब भोजन या चारा पशु को खिला देना जुगाली के लिए पर्याप्त समय ना  देना पशु में बदहजमी  आदि कारणों से पशु में यह रोग हो जाता है 

7 उदरशूल ⇨

80 प्रतिशत पशु रोग पशु के खान पान से संबंधित होते है जब पशु कड़ी सुखी घास या टहनी आदि खा लेते है और खाने के बाद या तो पानी नही पीते है या काम पानी पीने से उदरशूल हो जाता है इससे पशु के पेट में ज़ोरदार दर्द होता है पशु बार बार अपने पैर पटकता है दाँत पिसता है पशु बे चैन रहता है बहुत काम और बदबूदार गोबर करता है 

8 पशु में कब्ज ⇨

पशु अधिक मात्रा में सूखा चारा और भूसा खा लेने और कम पानी पीने से एवं  बदहजमी हो जाने पर पशु में कब्ज की शिकायत हो जाती है जिसमे पशु सूखा कड़ा सख़्त गोबर करता है और कभी कभी गोबर भी नही कर पाता है गोबर में कभी खून के छींटे या माँस की मात्रा भी आने लगती है 

9 खांसी ⇒

मौसम में परिवर्तन और बारिश में पशु का लगातार भीगना और फेफड़ों पर धूल का जम जाना एवं अपच के कारण पशु में खांसी हो जाती है जिसमे पशु बार बार खांसी का ठसका उठता है उसके उसके गले से खर्र खरर  की आवाज़ निकलती है और कफ जम जाता है ज्यादा समय तक खांसी रहने से पशु में निमोनिया और दमा जैसे रोग लग जाते है 

10 निमोनिया एवं दमा ⇒

मौसम के परिवर्तन और बरसात में बार बार भीगने और अधिक ठंडा पानी पीने से पशु में निमोनिया हो जाता है जिसमे बुखार के साथ शरीर कांपने लगता है पशु बेचैन रहता है उसे सास लेने में दिक्कत आती है वह अपने नथुनों को बार बार फूलता है और चलने और बैठने में पशु को परेशानी आती है उसकी आँखो का रंग लाल हो जाता है 
दमा  दमे में पशु जल्दी जल्दी ख़स्ता है और बहुत ही ज़ोर कर के पशु को खाँसना पड़ता है जिससे उसके पेट ओर खोख पर दबाव बढ़ता है और दर्द होता है खांसी के साथ बलगम भी आने लगता है यह रोग बदहजमी लम्बे समय तक खांसी रहने और ज्यादा मेहनत करने से होता है

11 पशु के पेशाब में खून आना ⇒

पशु के पेशाब में खून कही कारणों से आ सकते है जैसे अधिक धूप में रहने या काम करने से किसी तरह की ज़हरीली घास या पेड़ पोधों के पत्ते खा लेने से या फिर पथरी हो जाने पेशाब  की नली में घाव हो जाने से किसी अन्य पशु के द्वारा उस पशु को सींगों से कमर गुर्दो पर चोट पहुँचाने  से पशु में मूत्र के साथ खून आने लगता है और तेज़ बुखार भी पशु में आ जाता है

12 पशुओं में पीलिया ⇨

यह रोग पशु में जिगर की ख़राबी के कारण होता है जिसमे आँखों की झिल्लियों का रंग पीला पड़ जाता है पशु पिले रंग का पेशाब करने लगता है इसमें पशु की की भूख मर जाती है और प्यास बढ़ जाती है पशु कमजोर होने लगता है और पशु के शरीर का तापमान घटता बढ़ता रहता है

13  मर्गी ⇒

यह रोग खास कर के पशुओं के बच्चों में होता है इसका मुख्य कारण पशु के पेट के कीड़ों का पशु के दिमाग में चढ़ जाने से होता है जिसमे पशु अचानक कांपने लगता और चक्कर खा कर गिर जाता है और बेहोश हो जाता है इस अवस्था में पशु के हाथ पैर अकड़ जाते है और मुहँ से झाग आने लगते है

14 पशु को लू लगना ⇒

वैसे तो सभी पशु पलकों को पता होता है की पशु में लू केसे लगती है फिर भी में यहाँ बता देता हु ताकि अगली पोस्ट में रोगों के उपचार केसे करे उसमे इसके उपाय बता सके यह रोग गर्मी के दिनों में तेज़ धूप और गर्म हवाओं के लगने से होता है इसमें पशु ज़ोर ज़ोर से हापने लगता है पशु में ज्वर रहता है पशु बहुत कम खाता पिता है

15 पशु को ज़हरीले  जानवर काट जाने पर ⇒

कई बार पशु को जहरीले जानवर किट काट लेते है जैसे बिच्छू ,ततेया ,मधुमक्खी आदि काट जाने पर पशु अचानक बेचैन हो जाता है और उसे काटे गये स्थान पर जोरों से जलन होने लगती है और सर्प के काटने पर पशु में शीतलता आ जाती है पशु की आंखे पथरा जाती है पशु के शरीर का रंग काला नीला पड  जाता है पशु के नाड़ी की गति कम हो जाती है और पशु के मुँह से झाग निकलने लगते है

16 मसाने में पथरी ⇒

यह रोग पशु में रूखे सूखे एवं भारी पर्दाथ और कम पानी और चुनायुक्त अधिक पानी पीने से होता है इसमें पशु के गुर्दे ,मसाने में तेज़ दर्द होता है जिससे पशु बार बार उठता बैठता है पशु बेचैन रहता है पशु में मूत्र रुक रुक कर बूंद बूंद आता है मूत्र का रंग गहरा लाल रक्त मिश्रित रहता है

17 कृमि ⇒

कृमि कई रूप रंग आकर छोटे मोटे हो सकते हैअंकुश कृमि ,फीता कृमि ,पिन कृमि ,गोल चपटे कृमि ,फुफ्फुस कर्मी आदि इनकी कई सारी प्रजाति होती है। इन कृमियों के कारण कई सारे रोग पैदा हो जाते है कृमि पशु के पेट आंतो और फेफड़े आदि अंगों में रहते है। जो की गोबर और मूत्र  जरिये बाहर निकलते है और संक्रमण फैलाते है। ये कृमि सभी तरह के पशुओं में होते है जैसे गाय ,भैस ,बैल ,ऊट ,भेड़ बकरी ,घोड़ा ,सुअर ,कुत्ता ,बिल्ली ,मुर्गी में भी कई प्रकार से पाए जाते है। पशुओं के बच्चों में पेट के कीड़े की समस्या भी कृमि और बाहरी परजीवी के दुवारा होती है इन कृमियों के कारण कई सारे रोग पशु में लगते है जैसे चर्म रोग ज्वर दस्त पेशीच उपज कब्ज आदि

18 बवासीर ⇒

यह रोग जिगर और ज्यादा समय से पशु में कब्ज रहने से होता है इस रोग की पहचान करने के लिए पशु यदि गोबर के साथ खून मिला हुआ आता है तो पशु को बवासीर हो जाता है इस रोग में पशु के मलद्वार पर मस्से हो जाते है

19 जुकाम और सर्दी ⇒

यह रोग अधिक ठंडा पानी पी लेने से या फिर पशु का तेज़ गर्मी से अधिक ठंडी जगह पर आ जाने से होता है कभी कभी पशु को ज्यादा गर्मी में ठंडे पानी से नहला देने से भी हो जाता है इस रोग में पशु को बार बार छींक आती है नाक से पानी बहता है और नाक की झिल्ली लाल हो जाती है! ज्यादा सर्दी रहने पर  तेज़ बुखार भी आ जाता है

20 पशु में  लकवा ⇒

इस रोग में पशु का कोई अंग हिस्सा काम करना बंद कर  देता हैयह रोग रीड की हड्डी में कीड़े पड़ने चोट लगने से हो जाता है इसके अलावा पशु कभी जहरीली घास खाने से भी हो सकता है 

21  केल्सियम और फास्फोरस की कमी से होने वाले रोग ⇨

कैल्शियम और फास्फोरस की कमी के कारण पशु में निम्न रोग लग जाते ह 
पशु को भूख नही लगना 
रीड की हड्डी में टेढ़ापन आ जाना 
पशु के शरीर का ग्रोथ नही कर पाना 
दूध में कमी आ जाना 
पशु का गर्भ धारण नही कर पाना 
फास्फोरस की कमी होने से पशु हड्डी और मॉस खाना स्टार्ट कर देता है 
मित्रों इन रोगों के अलावा भी पशु में कई सारे रोग होते है जैसे 
पाईरो प्लाज्म से होने वाले रोग ,काक्सीडिया से खूनी पेचिस होता है ,प्रोटोजोआ से मलेरिया ,हेपाटोजुन ,आदि रोग लगते है 
दोस्तों इन मुख्य रोगों के अलावा भी पशुओं में कई सारे रोग होते है जिनकी समय समय पर पहचान कर के उचित इलाज़ पशुपालकों को करवाना चाहिए ताकि उनका पशु असमय ना मरे 
मेरा इस पोस्ट के लिखने का उद्देश्य बस यही था की किसान दोस्त इन पशु रोगों की पहचान कर समय पर पशु का उपचार करा ले ताकि पशु पालक को इस व्यवसाय में  हानि ना हो
दोस्तों आप पशु पालन से जुड़ी और पोस्ट पड़ना चाहते हो तो menu में जा कर पशु पालन वाले टेग को सलेक्ट करे!
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Sunday, December 25, 2016

Unknown

pashuo me hone wale rog or unki pahchan kese kre part 1 पशुओ के रोगों की पहचान भाग 1

नमस्कार दोस्तों आज हम इस पोस्ट में पशु पालन करने वाले किसानों के लिए बहुत ही काम की जानकरी ले कर आयें है उम्मीद है इस जानकरी से पशुपालको  को काफी लाभ मिलेगा आज की पोस्ट में हम बताएँगे

पशुओं में होने वाले रोग एवं उनकी पहचान कैसे  करे भाग 1

pashu me lagne wale rog ki janakri
पशु रोग की जानकारी 

मित्रों पशु पालन एक लाभ दायक  व्यवसाय है लेकिन यदि पशुपालक सावधानी नही रखे तो उसे भारी नुक्सान उठाना पड़ सकता है खासतौर पर जब पशु बीमार हो क्यों की वर्तमान में अच्छे दुधारू पशु का मूल्य काफी ज्यादा है और बीमारी के कारण कोई पशु मरता है तो इस धंधे में बहुत नुकसान होता है आज की इस पोस्ट में पशुओं में लगने वाले रोगों की पहचान के बारे में जानेंगे मैने इसको भाग 1 नाम इसलिए दिया क्यों की सभी रोगों को एक पोस्ट के माध्यम से बता नही सकते बाकी बचे रोगों के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा आप माय किसान दोस्त पर विजिट  करते रहे इन रोगों के बारे में बताने के बाद हम एक पोस्ट में पशुओं के रोगों का देशी इलाज यानि उपचार कैसे करे और पशुओं के लिए विभिन्न दवाइयों के बारे में भी लिखेंगे

पशुओं के प्रमुख रोग और उनके लक्षण 

संक्रमण रोग;- छूत के कारण होने वाले रोगों को संक्रमण रोग कहते है यह रोग पशु के शरीर में कई प्रकार के विषाणु चले जाने के कारण होता है फिर ये एक पशु से दूसरे पशु में लगते है फिर एक के बाद एक पशु बीमार होते है फिर एक महामारी के रूप में फेल जाते है 
संक्रमण से होने वाले रोगों के बारे में नीचे बताया गया है!

1 लगडा बुखार (black quarter)

जैसे की इसका नाम लगडा बुखार है उसी तरह इसका काम है इस बुखार में पशु के आगे पीछे के पैरो में सूजन आ जाती है और पशु लगडा लगडा चलता है इस में कीटाणु पानी अथवा शरीर पर लगे घाव के जरिये शरीर के अन्दर चले जाते है जिससे पशु का शरीर अकड़ने लगता है इसके कीटाणु पुरे शरीर में जहर बना देते है यदि समय पर उपचार नही किया जाया तो पशु एक दो दिन में ही मर जाता  रोग में पशु का शरीर सुस्त हो जाता है धीरे धीरे पूरा शरीर अकड़ जाता है बड़ी मुश्किल से चल पता है उसका सर और कान लटक जाते है। उसकी त्वचा पर सूजन दिखने लगती है। उसका पूरा शरीर गर्म हो जाता है और तीव्र बुखार आता है एवं सास लेने और छोड़ने पर परेशानी आती है इस अवस्था में वो खाना पीना बंद कर देता है यह रोग मुख्य रूप से गाय भैस एवं भेड़ में ज्यादा देखने को मिलता है छह वर्ष से दो वर्ष के पशु इसकी चपेट में ज्यादा आते है

2 माता रोग (rinderpest )

यह भी एक छूत वाला रोग ही है जो की पहाड़ी क्षेत्र  में रहने वाले पशुओं में अधिक पाया जाता है इस रोग का चार पांच दिन में आसानी से पता लग जाता है। इस रोग में सबसे पहले पशु को बहुत तेज़ यानि की 104 डिग्री से 106 डिग्री तक हो जाता है पशु सुस्त हो जाता है उसके शरीर के बाल खड़े हो जाते है पशु कांपने लगता है आँखो की पुतलिया सिकुड़ जाती है और आँखो से आँसू बहने लगते है कान सर और गर्दन लटक जाती है। पशु एस अवस्था में अपने दाँत पीसने लगता है और उसे प्यास लगने लगती है वो जुगाली करना बंद कर देता है सात आठ दिन बाद पशु के मुहँ में मसूड़ों और ज़ुबान के आसपास नुकीले छोटी किल tyap के छाले  हो जाते है और धीरे धीरे वो बड़े हो कर फोफले बन जाते है इसे ही छाले पशु के आंतों में भी हो जाते है पशु खाना पीना बंद कर देता है पतला गोबर करने लगता है कभी कभी उसके गोबर में खून आने लगता है मुँह में छाले की वजह से पशु भूखा रहता है और कमजोर पड़ जाता है और सात आठ दिन में पशु मर जाता है

3 गल गोटू रोग (haemorrhagic )

यह रोग मुख्य रूप से गाय भेसो में अधिक लगता है यह मानसून के समय व्यापक रूप से फैलता है यह बहुत ही तेज़ एवं भयंकर छूत  रोग होता है इसमें पशु के शरीर का तापमान 105 डिग्री से ले कर 108 डिग्री तक पहुँच जाता है। यह pesteurella multocida नामक जीवाणु  के कारण होता है। इस रोग में पशु के मुँह से लार टपकती है सिर और गले में बहुत दर्द होता है पशु कांपने लगता है खाना पीना छोड़ देता है। पशु के पेट में दर्द होता है वह ज़मीन पर गिर जाता है उसकी आंखे लाल हो जाती है श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है पशु खूनी दस्त करने लगता है उसकी जीभ का रंग काला पड़ जाता है और वो बाहर की और लटक जाती है इस बीमारी में ७० प्रतिशत पशु तत्काल मर जाते है। इसलिए इसका उपचार लक्षण पता चलते ही जितना जल्दी हो सके करना चाहिए इस रोग से मरे हुए पशु को दफ़ना चाहिए उसे फेंकना नही चाहिए वरना उसके संक्रमण से अन्य पशु इसी बीमारी के चपेट में आकर मर जाते है

4 खुर मुहँ पका रोग (foot and mouth disease )

पशुओं में खुर मुखपाक रोग अत्यधिक संक्रमण एवं घातक रोग होता है यह रोग फटे खुर वाले पशुओं में होता है यह रोग कभी भी किसी भी मौसम में हो सकता है। इस रोग के लक्षण रोग ग्रसित पैर का ज़मीन पर बार बार पटकना लगडा कर चलना खुर के आसपास सूजन रहना खुर में घाव और कीड़े पड़ना मुहँ से लार पटकना मुहँ जीभ ओष्ट पर छाले हो जाना स्वस्थ होने के बाद भी हापना बुखार का आना होठ लटक जाना रोग के अधिक बड जाने पर नथुने में फोफले बन जाना। दुधारू पशु में दूध की कमी आ जाती है उसकी कार्य करने की क्षमता  कम हो जाती है

5 विष ज्वर/बाबला रोग (anthrax )

यह भी एक संक्रमित रोग है गाय बेल भैस के अलावा यह अन्य पशुओं में भी होता है यह रोग कुत्तों और सुअर में नही होता है। इस बीमारी में पशु को 106 या 107 डिग्री तक तेज़ बुखार रहता है। इसमें पशु की त्वचा का रंग मटमैला और नीला पड़ जाता है पशु की आँखो की चमक ख़तम हो जाती है। इसमें पशु बेचन होकर खूटे के चक्कर लगता है और दर्द के मारे चिल्लाते भी है। गोबर के साथ खून का आना और गहरे रंग का पेशाब आना इसके लक्षण है फिर पशु बेहोश हो जाता है एक दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाती है

6 फुफ्फुस ज्वर (contagious pleuro pneumonia)

इस रोग को निमोनिया भी बोलचाल की भाषा में कहते है यह बहुत ही सूक्ष्म जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है इसमे सबसे पहले पशु को तेज़ बुखार आता है उसमे सभी लक्षण निमोनिया के दीखते है। पशु सुस्त हो जाता है और खाना पीना छोड़ देता है श्वास लेने छोड़ने में परेशानी आती है नाक में सर्दी रहती है और बार बार ख़ासी का ठसका उठता रहता है यह रोग अत्यधिक तेज़ हो जाने पर पशु की श्वास रुक जाती है और पशु की मृत्यु हो जाती है

7 सक्रमक गर्भपात (brucelosis)

यह रोग विशेष कर गाय और भेसो में होता है यह रोग बुसेला कीटाणु एवं संक्रमण के कारण होता है इसमें बच्चा समय से पहले ही गर्भ में गिर जाता है इस रोग में पांचवें या आठवें माह में ही गर्भपात हो जाता है जिससे पशु की जेर गर्भ में ही रह जाती है जिसे निकलना अतिआवश्यक हो जाता है इस रोग में योनी और गर्भाशय में सूजन आ जाती है और योनी का बाहरी भाग लाल हो जाता है

8 थनैला रोग (mastitis )

यह भी एक जीवाणु जन्य संक्रमित रोग है। जो की दुधारू पशुओं में होता है यह रोग कई तरीके के जीवाणु विषाणु यीस्ट एवं फफूंद और मोल्ड के संक्रमण के कारण होता है इस रोग के लक्षण में सर्वप्रथम पशु के थन गर्म हो जाते है थनों में सूजन एवं दर्द रहता है। इस दौरान पशु के शरीर का तापमान भी बड जाता है और पशु के दूध में की मात्रा और गुणवत्ता कम हो जाती है दूध में खून का छटका भी आता है

9 खूनी पेशाब आना (contagious red water )

इस रोग में पशु को तेज़ बुखार आता है जिससे आँख और जीभ पर पीलापन आ जाता है पेशाब के साथ साथ खून भी आने लगता है एवं दस्त लग जाती है 

10 दुग्ध ज्वर (milk fever)

मिल्क फीवर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं में केल्सियम की कमी के कारण होता है यह रोग प्राय 5 से 10 साल वाली मादा पशु में प्रजनन के तीन दिन के अन्दर इसके लक्षण दिखाई देते है जिसमे पशु के शरीर का तापमान कम हो जाता है पशु बेचैन रहता है उसके शरीर में अकडन आ जाती है जिस से वो टिक से चल फिर नही पता है और एक तरफ अपनी गर्दन लटकाए बैठा रहता है। यदि हम उसके सिर और गर्दन को सीधा करते है तो भी वह फिर से उसी ओर मोड़ के बेट जाता है

11 सुखा रोग (john disease)

यह भी एक संक्रमित रोग है जो " वैसीलस " नामक कीटाणु से लगता है इस रोग में ये जीवाणु पशु की लार गोबर मूत्र आदि के माध्यम से बाहर निकलते रहते है इस रोग का पता बहुत ही धीरे से चलता है इस रोग में पशु सुस्त रहता है उसके शरीर में खून की कमी हो जाती है पतला पतला गोबर करता है उसके जबड़े के नीचे सूजन रहती है इस रोग से पशु साल भर में मर जाता है

12 पशु में चेचक रोग (cow pox )

इस रोग में पशु के शरीर का तापमान ज्यादा हो जाता है एवं पशु के शरीर पर फफोले जैसे दाने दिखने लगते है यह रोग अधिकतर गाय और बेल में होता है भैस पर इसका असर बहुत ही कम होता है यह रोग बकरियों और भेडो के मेमनों को भी अधिक प्रभावित करता है जिसमे उनके शरीर के नाज़ुक भाग पहले प्रभावित होते है जैसे आँखो के चारों तरफ का भाग जांघों के अंदरुनी हिस्सा ऑतो में सूजन आ जाती है

13 जबड हड्डा एवं कंठजीभा रोग 

जबड हड्डा रोग में में पशु के जबड़े की हड्डी बड जाती है फिर उसमे धीरे धीरे फोड़े होने लगते है और भूख लगने पर भी सही तरीके से खा पी नही पता है। परिणाम स्वरूप पशु कमजोर हो जाता है
कंठजीभा रोग भी जबड हड्डा रोग से मिलता जुलता ही रोग होता है इसमें पशु की जीभ सूज कर कठोर हो जाती है और वो भी खा नही पता है और कमजोर हो जाता है यह दोनों ही रोग पशु की कमजोर हड्डी और जीभ जैसी ग्रथियो को प्रभावित करते है

14 पशु में चर्म रोग- खुजली,गजचर्म,और दाद 

 pashu me Dad khujli charm rog mkd
पशु में चर्म रोग 

मित्रों आपने कई बार पशुओं को दीवार पेड़ आदि से अपने शरीर और सींगों को खुजाते देखा होगा उसे हमें कभी भी नॉर्मली नही लेना चाहिए क्यों की ये गजचर्म हो सकता है इसमें पशु के शरीर के बाल धीरे धीरे उड़ जाते है और जिस जगह ज्यादा खुजली चलती है उस वाह की त्वचा सख़्त हो जाती है और धीरे धीरे वो पुरे शरीर पर फेल जाता है 
दाद भी एक संक्रमित रोग है जो एक पशु से दूसरे पशु में फेल जाता है यह रोग अधिकतर बरसात के बाद  में होता है यह रोग गंदगी और नमी के कारण होता है इसमें रोगी पशु के शरीर पर गोल गोल दाग चस्ते पड़ जाते है जिससे पशु को बहुत तेज़ खुजली चलती है फिर उन धब्बों यानि दाद के चारों तरफ छोटी छोटी फुंसियां हो जाती है और उन मे से पानी निकलने लगता है यदि वो अन्य पशु को लग जाये तो वो भी इस बीमारी की चपेट में आ जाता है
मित्रों आज की पोस्ट में हमने कुछ ही रोगों के बारे में जिक्र किया है अगली पोस्ट यानि भाग 2 में बाकी बीमारियों के बारे में लिखेंगे उसके उन सभी पशु रोगों के उपचार ओर उनसे बचाव के तरीकों पर पोस्ट लिखेंगे इस लिए आप माय किसान दोस्त पर विजिट  करते रहे
हेल्लो दोस्तों में कोई वैज्ञानिक या पशु चिकित्सक नही हु में भी एक छोटा सा किसान हु मेरा इस webside पर जानकरी देने का एक मात्र उद्देश्य किसान भाइयों की हेल्प करना हैयदि आपके पास भी इसी कोई जानकारी हो जिससे किसान भाइयों को लाभ मिल सके तो मुझे ज़रुर लिखे उसे में आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित करुँगा यह सब जानकारियां आप जैसे अच्छे मित्रों द्वारा दी जाती है यदि इस साइड में दी गयी जानकारी में कोई ग़लती हो या आपका कोई सुझाव हो तो मुझे ज़रुर बताये में आपका आभारी रहुगा !

पशु रोगों की पहचान भाग 2 यहाँ पढ़े ⇐

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